भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०७ गोपियां परस्पर कहने लगीं, "देखो सामने कृष्ण को देख राधारानी मद से अन्धी हो गई हैं।" यह प्रेमजनित मद है। गर्व गर्व नाम भाव की अभिव्यक्ति अत्यन्त सौभाग्य, अनिन्द्य सौन्दर्य, उत्तम निवास, अथवा इष्ट-प्राप्ति के कारण होती है। जो दूसरों की अवहेलना करता है, वह भी गर्वित माना जाता है। बिल्वमंगल ठाकुर कहते हैं, "हे प्रियतम कृष्ण ! तुम जो मुझे निर्बल जान कर बलात् हाथ छुड़ाकर जा रहे हो, इसमें तुम्हारी क्या महिमा है। मैं तो तुम्हारी वीरता तब जानूँ जब तुम मेरे हृदय से निकल जाओ।" यह कृष्णप्रेम में गर्व का भाव है। जब राधारानी रासमण्डल को त्याग कर चली गयीं और श्रीकृष्ण उन्हें मनाने गए तो राधा की एक सखी श्रीकृष्ण से बोली, "हे कृष्ण ! तुमने हमारी राधारानी की अतिशय सेवा की है और अब उन्हें खोजने अन्य सब गोपियों को त्याग चले हो। कहो, उनसे कैसा व्यवहार चाहते हो?" यह रूपयौवन से उत्पन्न गर्व है। कभी राधारानी अपने अन्तर में गर्व करके कहतीं, "गोपबालक भले ही श्रीकृष्ण के लिए सुगन्धित पुष्पों की मालाएं बनाया करें; परन्तु जब मैं अपनी माला उन्हें पहनाती हूँ तो विस्मित होकर वे उसे तुरन्त हृदय पर धारण करते हैं।" इसी भाँति श्रीमद्भागवत (१०.२.२३) में ब्रह्माजी कहते हैं, "हे मधुसूदन ! आपके सौहार्द के अनुभवी शुद्धभक्त मार्गभ्रष्ट नहीं होते। आपके द्वारा रक्षित होने से वे सदा शत्रुओं के सिर पर निश्चिन्त विचरते हैं।" अर्थात् भगवान् के चरणकमलों में पूर्ण रूप से शरणागत पुरुष सदा अपने सारे शत्रुओं को जीतने का गर्व करता है। मथुरा के एक दरजी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे वृन्दावननाथ ! अपने पर आपकी अहैतुकी कृपा का मुझे ऐसा गर्व है कि महर्षियों द्वारा ध्यान में अभिलाषित वैकुण्ठनाथ के अनुग्रह की भी मुझे अपेक्षा नहीं है।" भाव यह है कि यद्यपि योगी-मुनि वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु का ध्यान लगाते हैं, कृष्णभक्त को ऐसा गर्व रहता है कि वह इस ध्यान को अधिक महत्त्व नहीं देता। गर्व का यह भाव जीवन के परम लक्ष्य श्रीकृष्ण की प्राप्ति हो जाने से होता है।