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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

२१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु लोटती हैं, उच्च स्वर से चिल्लाती हैं और फिर शान्त समुद्र जैसे मूर्च्छित हो जाती हैं। कृष्ण से विरह के ये लक्षण अपस्मार कहलाते हैं। प्रेम के इन भावों का उदय होने पर भक्त को अपनी तनिक भी सुध-बुध नहीं रहती । श्रीकृष्ण को एक यह सन्देश भी भेजा गया कि उनके द्वारा कंस के मारे जाने से कंस का एक असुर मित्र घोर दशा को प्राप्त हो गया है। उसके मुख से फेन निकलता है और भुजाओं को घुमाता हुआ वह भूमि पर लोट रहा है। यह भयानकाभास श्रीकृष्ण से सम्बन्धित भयानकरस में जन्म लेता है। भयानकरस कृष्ण विषयक रसों में एक गौण रस है। प्रथम पाँच रस (शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य) मुख्य माने गए हैं; अन्य सातों रस (भयानक, वीभत्स, रौद्र, करुण, हास्य, अद्भुत तथा वीर) गौण हैं। जिस किसी रूप में उस दैत्य का कृष्ण से कोई सम्बन्ध अवश्य रहा होगा, क्योंकि श्रीकृष्ण ने कंस को मार डाला—यह सुनते ही उसमें उपरोक्त भाव प्रकट हो गए। श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि इस प्रकार के लक्षण (आभास) में भी विशेष चमत्कार होता है । व्याधि वृन्दावन से दूर मथुरा में रहते हुए श्रीकृष्ण को कुछ मित्रों ने सूचित किया, “हे कृष्ण ! तुम्हारे असह्य विरह में व्रजवासी व्याधि से पीड़ित प्रतीत होते हैं। उनके शरीर ज्वरित हो गए हैं और वे भलीभाँति चल भी नहीं सकते । भूमि पर पड़े-पड़े केवल दीर्घ श्वास लेते रहते हैं।” श्रीमद्भागवत (१०.१२.४४) में भगवान् अनन्त के सम्बन्ध में महाराज परीक्षित की जिज्ञासा को सुनकर शुकदेव गोस्वामी में शिथिलता के लक्षण प्रकट होने लगे। फिर भी उन्होंने उनको रोक दिया और मन्द स्वर से परीक्षित का समाधान किया। यह शिथिलता दिव्य आनन्द के कारण उत्पन्न होने वाली ज्वर की अवस्था है । श्रीमद्भागवत में ही वर्णन है कि अपनी शैशवकालीन लीलाओं में अनेक वर्ष बाद जब व्रजांगनाओं और श्रीकृष्ण का कुरुक्षेत्र में मिलन हुआ तो सारी गोपिकाएँ स्तब्ध हो गईं। उनका श्वास, पलकों का गिरना आदि सम्पूर्ण व्यापार रुद्ध हो गए और वे कृष्ण के समाने पुतली सी खड़ी रह गयीं । यह हर्षातिशय से उत्पन्न व्याधि है ।