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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २११ कि श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में निर्विशेषता का कोई प्रश्न नहीं है। श्रीकृष्ण के नाना सम्बन्धों में सभी प्रकार की सविशेष क्रियाएँ होती हैं। उन्माद श्री बिल्वमंगल ठाकुर स्वरचित ग्रन्थ में प्रार्थना करते हैं, "श्रीमती राधारानी सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करें क्योंकि उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया है। कृष्ण प्रेम में वे कभी पागल के समान खाली पात्र में दही मन्थन का प्रयास करती हैं। यह दृश्य देखकर श्रीकृष्ण ऐसे मुग्ध हुए कि गाय के स्थान पर साँड को दोहने लगे।" राधाकृष्ण के प्रेम विषयक ये उन्माद के कुछ उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि श्रीकृष्ण के कालीदह में प्रवेश करने से यशोदा मैया को उन्माद हो गया। विष की औषधि खोजने के स्थान पर वे वृक्षों से बोलने लगीं, मानों वे मान्त्रिक हों। वृक्षों को हाथ जोड़ प्रणाम करते हुए बोलीं, "कृपया उस ओषधि का पता बताइए जिससे कृष्ण विषमय जल के प्रभाव से बच जायें।" यह आपदा के कारण उत्पन्न उन्माद है। भक्त में प्रेम के उन्माद का वर्णन श्रीमद्भागवत (१०.३०.४) के उस प्रसंग में है जब गोपियाँ वृन्दावन के निकुंजों में श्रीकृष्ण का अन्वेषण कर रही थीं। एक वन से दूसरे वन में उन्हें खोजती हुई गोपिकाएँ उच्च स्वर से उनकी कीर्ति का गान करती जाती थीं। उन्हें पता था कि श्रीकृष्ण एकदेशीय नहीं हैं, वरन् विभु हैं। वे आकाश में हैं, वे जल में हैं, वे वायु में हैं, वे प्राणीमात्र के हृदय में परमात्मा हैं। अतः नाना प्रकार के पेड़- पौधों से वे उनका पता पूछने लगीं। भक्तों में होने वाला यह विरहजनित उन्माद है। इस उन्माद का अन्तर्भाव यद्यपि व्याधि के अन्तर्गत हो जाता है, तथापि विप्रलम्भ आदि में उसमें विशिष्ट चमत्कार की उद्भावना होती है। महाभाव का उदय होने पर मोहन को प्राप्त हो जाने पर यह उन्माद विकसित होकर दिव्योन्माद बन जाता है। अपस्मार जब श्रीकृष्ण वृन्दावन में नहीं थे और मथुरा में रह रहे थे तो राधा- रानी ने सन्देश प्रेषित किया कि मैया व्रजरानी को उनका ऐसा तीव्र विरह सता रहा है कि समुद्र के समान मुख से फेन निकलता है। कभी-कभी सागर की तरंगों के सदृश भुजा उत्तेजित करती हैं, विरहवश भूमि पर