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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

२१० ] भक्तिरसामृतसिन्धु गायैं और गोप आदि श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण में एकत्र हो गये । यह वर्षा से उत्पन्न आवेग है । श्रीकृष्ण के वृन्दावनवास के काल में वहाँ अनेक बार ओले बरसे । वृद्धजन उनसे कहते, “हे कृष्ण ! इस समय तुमसे बड़े भी त्रस्त हो रहे हैं। फिर तुम तो नन्हें से बालक ही हो, इसलिए बाहर बिलकुल मत निकलना ” यह ओले गिरने से आवेग का उदाहरण है । यमुना के विषाक्त जल में कृष्ण को कालिया-दमन करते देख यशोदाजी भावविह्वल दशा में कहने लगीं—“देखो-देखो ! पृथ्‍वी हिल रही है और आकाश में उल्काएँ घूम रही हैं। मेरा नन्हा सा पुत्र विषमय यमुनाजल में प्रवेश कर गया है, ऐसे में मैं क्या करूँ ?” यह उत्पातजनित आवेग है । कंस के यज्ञ में जब विशाल हाथी ने श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया तो वहाँ उपस्थित सब स्त्रियाँ कहने लगीं, “हे कृष्ण ! इस स्थान से तुरन्त दूर हट जाओ । हट जाओ । क्या तुम नहीं देखते कि विशाल हाथी तुम पर चढ़ा आ रहा है ? तुम्हारी मृदुता को देखकर हमारा चित्त व्यथित हो रहा है ।” इस पर श्रीकृष्ण ने यशोदा मैया से कहा, “हे जननि ! वेग से आते हुए धूलि से इन कमलनयनी स्त्रियों को अन्धा करने वाले इन हाथियों और घोड़ों से क्यों घबराती हो । मेरे सामने केशी दैत्य ही क्यों न आ जाय, ये बाहु विजय के लिए पर्याप्त हैं। इसलिए घबराओ नहीं ।” ‘ललितमाधव’ में एक सखी यशोदा मैया से कहती, “पर्वत के समान विशाल और बलशाली शंखचूड़ असुर ने जब तुम्हारे मदन जैसे मनोहर शिशु पर आक्रमण किया तो इसकी सहायता करने वाला वृन्दावन में कोई नहीं था। फिर भी आश्चर्य का विषय है कि कृष्ण ने उस दैत्य को मार डाला । अवश्य ही तुम्हारे किसी पूर्व पुण्यफल के कारण ही पुत्र का इस प्रकार विपत्ति से उद्धार हुआ है ।” ‘ललितमाधव’ में ही कृष्ण द्वारा विवाह-मण्डल से रुक्मिणी के हरण का वर्णन है। उस समय सभी उपस्थित राजा आपस में कहने लगे, “हमारे पास हाथी, रथ, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र, बाण, धनुष आदि सभी कुछ हैं, फिर हम इस कृष्ण से क्यों डरें ? आओ सब मिलकर इस पर आक्रमण करें । देखें, यह कामी गोपबालक राजकुमारी का अपहरण कैसे करता है ।” यह शत्रु-दर्शन से उत्पन्न आवेग का उदाहरण है । श्रील रूप गोस्वामी उपरोक्त उदाहरणों से सिद्ध करना चाहते हैं