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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 380 में से

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कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [ २१५ श्रीमद्भागवत (१०.३६.३६) में एक अन्य उल्लेख है। जब तक मथुरा जाते हुए श्रीकृष्ण के रथ की ध्वजा तथा चारों ओर उड़ती हुई रेणु दिखाई देती रही, जिनके हृदय श्रीकृष्ण का अनुगमन कर रहे थे, वे गोपियाँ तब तक चित्रलिखित सी जड़ खड़ी रहीं। श्रीकृष्ण से एक सखी ने कहा, "हे मुकुन्द ! तुम्हारी विरहव्यथा से पीड़ित गोपबालक दुष्ट पुजारी के घर की देवमूर्तियों के समान लगते हैं।" व्यवसायी ब्राह्मण मूर्तिपूजा को धनोपार्जन का साधन बना लेते हैं। उन्हें श्रीमूर्र्ति से प्रेम नहीं होता, वे तो बस सन्त का वेष बना कर धन कमाने में रुचि रखते हैं। इसलिए इन ब्राह्मणों द्वारा सेवित मूर्तियों का भलीभाँति श्रृंगार नहीं होता। वे उनके वस्त्रों को नहीं बदलते और शरीर का मार्जन भी नहीं करते। परिणाम में ऐसी मूर्तियाँ मलिन और नीरस दिखती हैं। वास्तव में तो मूर्तिपूजा में अतिशय सावधानी की अपेक्षा है; नित्य नूतन वस्त्र-श्रृंगार किया जाय तथा यथासम्भव आभूषण आदि भी रहने चाहियें। सब कुछ इतना स्वच्छ हो कि मूर्ति से सारे आगन्तुक मुग्ध हो उठें। मूर्ति सब का आकर्षण करे। यहाँ श्रीकृष्ण के सखाओं को व्यवसायी ब्राह्मणों के घर की उपेक्षित मूर्तियों की उपमा दी गई है, क्योंकि वे बिलकुल भी आकर्षक नहीं होतीं। श्रीकृष्ण के विरह में उनके सखा ऐसे ही लग रहे थे। व्रीडा (लज्जा) श्रीकृष्ण से प्रथम परिचय-मिलन में राधारानी को अतिशय लज्जा लगी। सखी बोली, "हे राधे ! कृष्ण को तुमने स्वयं अपने सुन्दर तनु का अर्पण कर दिया है। अब 'कृपणता' न करो। उनकी ओर प्रेम भरी दृष्टि डालो। हाथों को बेच देने पर फिर अंकुश के लिए विषाद कैसा ?" कृष्ण- प्रेम के अन्तर्गत यह व्रीडा नवीन संगम में होती है। पारिजात के लिए श्रीकृष्ण से युद्ध में परास्त होने पर देवराज इन्द्र अत्यन्त लज्जित हुआ। वह सिर झुकाए श्रीकृष्ण के आगे खड़ा था, तब श्रीकृष्ण ने कहा, "अच्छा इन्द्र ! तुम इस पारिजात को ले जाओ, नहीं तो अपनी स्त्री शची का मुख कैसे देख पाओगे ?" इन्द्र की व्रीडा पराजय के कारण थी। एक दूसरे अवसर पर श्रीकृष्ण उद्धव के नाना गुणों का स्तवन करने लगे। इससे उद्धव का सिर लज्जावश अवनत हो गया। 'हरिवंश' में रुक्मिणी के उच्च पद से अपने को अपमानित समझ कर सत्यभामा ने कहा, "तुम्हारी प्रिया होकर भी मैं अप्रिय बन गई हूँ,