भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु इसलिए वासन्तिक पुष्पों से परिपूर्ण रैवतक पर्वत को फिर कैसे देख सकूँगी ?” यह अवज्ञाजनित व्रीडा का उदाहरण है। अवहित्था (गोपन) बाह्य रूप से किसी अन्य भाव को प्रकट करके अपने यथार्थ मनोभाव का गोपन किए रहना प्रेम का ‘अवहित्था’ नामक लक्षण है। इसमें इधर- उधर देखने, व्यर्थ चेष्टा करने और वाणी की भंगी से अपनी वास्तविक मनोदशा को छिपाने का प्रयत्न होता है। मनोभाव के पारंगत आचार्यों के अनुसार अपने यथार्थ स्नेह को छिपाने के ये प्रयास एक प्रकार के अनुभाव ही हैं। श्रीमद्भागवत (१.३२.१५) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं, “हे राजन् ! गोपिकाएँ स्वभाव से ही सुन्दर और रहस्यमय हास एवं आकर्षक आभूषणों से अलंकृत थीं। काम का उद्दीपन करने वाले अपने विहार में वे कभी श्रीकृष्ण के करकमल को अंक में रख लेतीं तो कभी वक्षःस्थल पर धारण करतीं। इसके बाद अपने भाव को छिपाते हुए वे श्रीकृष्ण से ऐसे बोलतीं मानो अत्यन्त कुपित हों।” प्रेम में इस गोपन का एक अन्य उदाहरण है। जब श्रीकृष्ण ने, जो हास-परिहास में परम दक्ष हैं, पारिजात वृक्ष को सत्यभामा के प्रांगण में आरोपित कर दिया तो विदर्भनन्दिनी राजराजेश्वरी रुक्मिणी देवी को बड़ी ईर्ष्या हुई। परन्तु अपनी स्वाभाविक सुशीलता के कारण उन्होंने उसे व्यक्त नहीं होने दिया। अतः रुक्मिणी के यथार्थ मनोभाव को कोई नहीं जान सका। यह औदार्य के रूप में प्रकट अवहित्था का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (१.११.३२) में एक अन्य दृष्टान्त है। श्रीकृष्ण के द्वारका में प्रवेश करने पर यदुवंशियों ने उनका नाना प्रकार से यथायोग्य अभिवादन किया। दूर से ही पति को आया देखकर स्त्रियाँ मन ही मन उनका परिरम्भण करती हुई उन्हें मृदु कटाक्ष से निहारने लगीं। श्रीकृष्ण कुछ निकट आए तो उन्होंने अपने पुत्रों को उनका आलिंगन करने के लिए आगे कर दिया। दूसरी लज्जावश आँसुओं को गिरने से रोक रही थीं पर सफल न हो सकीं। यह लज्जा जनित अवहित्था है। किसी अन्य समय, श्रीकृष्ण को किसी अन्य स्त्री में अनुरक्त जानकर राधारानी सखी से कहती हैं, “हे दूति ! कृष्ण का किसी अन्य स्त्री में अनुराग है, यह स्मरण होते ही मेरा शरीर भयभीत और रोमांचित हो