भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [२१७
जाता है । परन्तु कहीं ऐसी दशा में वह मुझे देख न लें । सावधान रहूँगी । यह लज्जा और कुटिलता से उत्पन्न अवहित्था है । कहा गया है, "श्रीकृष्ण के लिए राधारानी में गाढ़ अनुराग था, पर उन्होंने उसे अपने हृदय में गम्भीर रूप से छिपा रखा था, जिससे उनकी यथार्थ स्थिति को कोई न जान सका ।" यह सौजन्य से उत्पन्न अवहित्था है । एक समय जब श्रीकृष्ण और उनके गोप-सखा सख्यवार्ता का आनन्द उठा रहे थे, श्रीकृष्ण का सेवक पत्री भी वहाँ आनन्द ले रहा था । पर फिर अपने दास्यभाव को स्मरण करके स्वामी के आगे सिर झुका दिया और श्रद्धावनत बड़ी कठिनाई से अपनी हँसी को रोका । यह हँसी का रोकना गौरव जनित गोपन है । स्मृति श्रीकृष्ण की स्मृति से होने वाले अनेक प्रेम-लक्षण हैं । जैसे, एक सखा ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे मुकुन्द ! आकाशचारी नीलमेघ को देखते ही कमलनयनी राधारानी को तुम्हारा स्मरण हो आया और वह तुम्हारे संग के लिए कामातुरा हो गयीं।" यह श्रीकृष्ण के सदृश वस्तु को देखने से प्रेमवश कृष्ण-स्मरण होने का उदाहरण है । श्रीकृष्ण का विग्रह नीलमेघ वर्ण का ही है, अतः उसे देखकर राधारानी को श्रीकृष्ण का स्मरण हो आया । एक भक्त कहता है कि ध्यान में प्रमाद करने पर भी कभी-कभी श्रीकृष्ण के चारुचरण युगुलारविन्द हृदय में स्फुरित हो जाते हैं । यह स्मृति निरन्तर अभ्यास का प्रभाव है । भाव यह है कि जो भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण के चरणकमलों का स्मरण करते हैं, वे क्षणिक रूप से ध्यान से विचलित भी हो जायें तो भी श्रीकृष्ण के चरणकमलों को हृदय में प्रकट देखेंगे । वितर्क ब्राह्मणवंशी मधुमंगल श्रीकृष्ण का परम अंतरंग सखा था । श्रीकृष्ण के अधिकांश सखा वैश्यकुलों से थे; परन्तु कुछ ब्राह्मणवंशी भी थे । वृन्दावन में वैश्यों और ब्राह्मणों की प्रधानता है । यह मधुमंगल एक दिन श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे सखे ! तुम्हारे सिर से मोरमुकुट बिलकुल गिर पड़ा और तुम्हें पता भी नहीं । उस पुष्पमाला का भी तुम्हें ध्यान नहीं है जो तुम्हें अर्पित की गई थी । तुम्हारे नेत्ररूपी भ्रमर श्रीमती राधारानी के