भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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नेत्ररूप कमलों पर मँडरा रहे हैं, उसी का यह परिणाम है।" यह प्रेम में वितर्क का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को भ्रमण के लिए जाते हुए देखकर राधारानी की एक सखी उनसे कहने लगी, "हे सखि ! क्या यह तमालवृक्ष है ? नहीं, क्योंकि इसमें गति और सौन्दर्य प्रकट दीख रहा है। फिर क्या यह मेघ है ? नहीं, क्योंकि इसमें (मुखरूप) अमल-धवल चन्द्रमा चमक रहा है और त्रिभुवन- मोहिनी मधुर अतिमधुर वंशीध्वनि भी सुनाई दे रही है। अतः हे चन्द्रवदना ! निश्चय ही गोवर्धन पर्वत पर मुकुन्द खड़े हैं।" यह भी प्रेम में वितर्क का रूप है। चिन्ता श्रीमद्भागवत (१०.२६.२६) में श्रीकृष्ण का उन्हें घर लौट जाने को कहना गोपिकाओं को अत्यन्त अप्रिय लगा। इससे मर्माहत होने के कारण वे दीर्घ श्वास लेने लगीं और उनके सुन्दर मुख सूख से गए। इस अवस्था में वे निस्पन्द खड़ी रहीं। वे पैरों से धरती को कुरेद रही थीं और उनकी अश्रुधारा स्तनों पर उपलिप्त कुंकुम को धो चली थी। यह प्रेम के चिन्ता नामक व्यभिचारी भाव का द्योतक है। एक सखा श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे मुरारि ! तुम्हारी स्निग्ध स्वभाव स्नेहमयी माँ यशोदा तुम्हारे घर न लौटने से अतिशय चिन्तित है। घर के प्रांगण में तुम्हारी प्रतीक्षा में उसने बड़ी कठिनाई से सान्ध्य-काल बिताया है। वह मलिनमुख, चिन्ता से व्याकुल और दुर्बल सी हो गयी है। हे क्रीड़ारस के लोभी ! आश्चर्य है तुम अपने घर और मैया को भी भूल गए।" यह प्रेम में होने वाली प्रगाढ चिन्ता का उदाहरण है। मथुरा में श्रीकृष्ण के लौट आने के लिए आतुरता से प्रतीक्षा करती हुई यशोदा मैया को नन्द महाराज ने इस प्रकार सांत्वना दी, "हे यशोदे ! गहन अन्तश्चिन्ता के कारण नेत्रों से झरती गरम अश्रुधारा से अपने मुखकमल को प्लावित मत करो। मैं तुरन्त अक्रूर के साथ कंस के प्रासाद में जाकर तुम्हारे पुत्र को लौटा लाऊँगा।" यह श्रीकृष्ण के कष्ट से उत्पन्न चिन्ता है। मति पद्मपुराण के वैशाख माहात्म्य में एक भक्त कहता है कि यद्यपि अट्ठारह पुराणों में से कुछ पुराणों में भगवान् विष्णु के कीर्तन की पद्धति का