भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [ २१६ उल्लेख नहीं है, और देवताओं के माहात्म्य का कल्प की अवधि तक प्रतिपादन है। परन्तु पुराणों का ध्यानपूर्वक स्वाध्याय करने से सिद्ध हो जाता है कि विष्णु आदिपुरुष भगवान् हैं। यह मति से विकसित प्रेमभाव का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (१०.६०.३६) में रुक्मिणी देवी के उस पत्र का उल्लेख है जिसमें उन्होंने श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि किसी और से उन (रुक्मिणी) का विवाह हो, इससे पहले ही श्रीकृष्ण उन्हें अवहरण कर ले जायें। उस समय श्रीकृष्ण के लिए अपने अनुराग को रुक्मिणी देवी ने इस प्रकार व्यक्त किया था, "हे प्राणनाथ ! प्राकृत बन्धन से मुक्त मुनिजन आपकी दिव्य कीर्ति का गान करते हैं। इसके लिए आप उन भक्तों को आत्मदान कर बैठते हैं। आपके कृपा-कटाक्ष से कल्याण होता है और आपकी टेढ़ी भ्रुवों से प्रेरित सनातन काल के प्रभाव से सम्पूर्ण सुख नष्ट भी हो जाता है। इसलिए मैंने ब्रह्मा, इन्द्र आदि को छोड़कर आपको ही पतिरूप में वरण किया है। फिर अन्य देवताओं के लिए तो कहना ही क्या है ?" श्रीकृष्ण का चिन्तन करने मात्र से रुक्मिणी ने अपने प्रेम का वर्धन कर लिया। यह प्रेम में मति का दृष्टान्त है। धृति ज्ञान, दुःखों की निवृत्ति अथवा भक्ति रूपी जीवन के अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति से होने वाली पूर्ण तृप्ति को धृति कहते हैं। इस अवस्था में मन पूर्ण रूप से स्थिर हो जाता है, बड़ी से बड़ी हानि से उद्विग्न नहीं होता और न उसे कुछ भी अपूर्णता रहती है। विद्वान् भर्तृहरि के अनुसार, धृति की अवस्था को प्राप्त पुरुष सोचता है, "भिक्षा माँगकर खाने वाले, दिशारूप वस्त्र को ही धारण किए हुए भूमि पर बिना गद्दे सोने वाले मुझे राजा की दासता से क्या काम ?" भाव यह है कि जिसमें भगवत्प्रेम का उदय हो जाता है, वह देहात्मबुद्धि में कठिनाई समझे जाने वाली किसी भी परिस्थिति को सहन कर सकता है। श्रीकृष्ण के पिता नन्द महाराज विचार किया करते थे, "मेरी गौशाला लक्ष्मी की क्रीड़ाभूमि हो रही है और हजारों गायें उसमें इधर- उधर दौड़ती हुई भ्रमण कर रही हैं। इससे भी अधिक, घर में कृष्ण के समान शक्तिशाली और अद्भुत कर्म बालक सुशोभित है। इसलिए गृहस्थ में भी मेरी पूर्ण तृप्ति हो गई है।" यह दुःख के अभाव से उत्पन्न धृति है। एक अन्य प्रसंग में कोई दूसरा भक्त कहता है, "श्रीकृष्ण के अनन्त-