भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अनुपम अखिल रससार माधुरीगुण निलय लीलामृत सागर में विहरण करता हुआ मेरा मन धर्म, अर्थ, काम और ब्रह्मलीनता नामक मोक्ष को तृण के समान भी नहीं समझता है।" यह विश्व में सर्वोत्तम वस्तु की प्राप्ति से उपलब्ध धृति का उदाहरण है। कृष्णभावनाभावित हो जाना ही विश्व में सबसे उत्तम है। हर्ष 'विष्णुपुराण' में वर्णन है कि जब अक्रूरजी कृष्ण-बलराम को मथुरा ले जाने के लिए आए, तो उन दोनों को देखते ही उनका मुखकमल खिल उठा और सारे शरीर में पुलक आदि प्रेम के भाव छा गए। श्रीमद्भागवत (१०.३३.११) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को अपनी चन्दनालिप्त भुजा को अपने स्कन्ध पर रखे हुए देखकर रास करती हुई वह गोपी अतिशय हर्षित हो उठी और उसने श्रीकृष्ण को चूम लिया। यह अभीष्ट लाभ-जनित हर्ष है। उत्सुकता श्रीमद्भागवत (१०.७१.२३) में उल्लेख है, "श्रीकृष्ण द्वारका से इन्द्रप्रस्थ पधारे हैं"-यह सुनकर वहाँ की युवतियाँ उनके दर्शन के लिए इतनी उत्सुक हो उठीं कि रात्रि में अपने-अपने पतियों के साथ विश्राम करते हुए भी वे अपनी उत्कण्ठा को रोक न सकीं। उनकी वेशभूषा अस्त- व्यस्त हो रही थी, केश खुले थे और यद्यपि उन्हें बहुत से घर के काम थे, फिर भी वे सब कुछ छोड़कर तुरन्त श्रीकृष्ण को देखने राजमार्ग पर दौड़ पड़ीं।" यह प्रेम का औत्सुक्य है। अपने ग्रन्थ स्तावली में श्रील रूप गोस्वामी ने श्रीमती राधारानी से कृपा की याचना की है, जो श्रीकृष्ण के वेणुरव से मुग्ध होकर वृन्दावन- वासियों से उनका पता पूछने लगीं। श्रीकृष्ण का पहले-पहले दर्शन करते ही वे प्रेम और आनन्द से कुछ ऐसी परिपूर्ण हो गयीं कि कान को खुजलाने लगीं। व्रजांगनाएँ एवं राधारानी चतुर वार्ता करने में बड़ी कुशला हैं, अतः श्रीकृष्ण को आते हुए देखते ही वे परस्पर वार्ता करने लगीं। श्रीकृष्ण भी कम लीलारस-विदग्ध नहीं हैं; वे उनके लिए पुष्प-चयन के व्याज से तुरन्त वहाँ से हट कर पर्वत की कन्दरा में चले गए। गोपिकाओं और श्रीकृष्ण की औत्सुक्यमयी प्रेम-क्रीड़ा का यह अन्यतम उदाहरण है।