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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 380 में से

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पृष्ठ 250

कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [ २२३ गुप्त रूप से प्रविष्ट होकर तथा मगधराज के सम्पूर्ण सैन्यबल को नष्ट करके मुझ को अपहरण करके राक्षस-विधि से विवाह कीजिए।” वैदिक पद्धति के अनुसार विवाह आठ प्रकार के होते हैं, जिनमें राक्षस-विवाह भी आता है। इसमें किसी कन्या का बलपूर्वक अपहरण कर उससे विवाह किया जाता है। रुक्मिणी का विवाह उसके भाई की इच्छा से शिशुपाल से होने जा रहा था; तभी उसने यह पत्र लिखकर श्रीकृष्ण से अपना अपहरण करने का अनुरोध किया । एक गोपी बोली, “जिससे गुरुजनों के सामने भी हमारी सारी शील- लज्जा खो जाती है, कृष्ण की वह मधुर और चपल वंशी यमुना की तरंगा- वली में बहकर सागर में गिर जाय।” निद्रा प्रतिदिन सन्ध्या समय श्रीकृष्ण वन से गोचारण करके लौटते थे । कभी-कभी उनके आने की सूचिका वंशीध्वनि को न सुनने के कारण चिन्ता के आक्रान्त हृदया यशोदा मैया को जड़ता आ घेरती थी । अतः कृष्णप्रेम में चिन्ताजनित निद्रा का भी अनुभव हो सकता है। श्रीकृष्ण का बन्धन करके मैया सोचने लगी, “कृष्ण के अतिशय मृदु एवं कोमल अंग को बाँधने का काम मुझसे कैसे बन पड़ा ?” बस, यह सोचते ही बुद्धि में द्वन्द्व के कारण उसे निद्रा आ गयी । गोपियों को उनके बड़े-बूढ़ों ने रात्रि में द्वार बन्द करके सोने को कहा था, पर अपनी निश्चिन्तता में उन्होंने इसका अच्छी प्रकार से पालन नहीं किया । श्रीकृष्ण के स्मरण में तन्मयता के कारण निर्भय हुई गोपियाँ रात्रि में अपने घरों के प्रांगण में ही सुखपूर्वक सो जातीं । यह श्रीकृष्ण के प्रति स्वाभाविक स्नेह से उत्पन्न प्रेम की निद्रा है। यह जिज्ञासा हो सकती हैं कि कृष्णभक्तों को निद्रा क्यों होती है; निद्रा तो साधारणतः तमोगुण का लक्षण माना जाता है। इसके समाधान में श्रील जीव गोस्वामी लिखते हैं कि कृष्णभक्त माया के सभी गुणों से सदा मुक्त रहते हैं, उनकी निद्रा प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं होती । उसे तो भक्ति में समाधि माना जाता है । ‘गरुडपुराण’ में साक्षात् श्रीभगवान् के आश्रय में स्थित योगियों के सम्बन्ध में प्रामाणिक वाक्य है—“जाग्रत, निद्रा औ सुप्ति—चेतना की तीनों अवस्थाओं में भक्तजन भगवान् के स्मरण में लीन रहते हैं। अतः वास्तव में वे सोते नहीं ।”