भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४] भक्तिरसामृतसिन्धु
स्वप्न एकबार बलरामजी स्वप्न में कहने लगे, "हे कमलनयन (कृष्ण)! आपकी बाललीला आपकी स्वेच्छा से ही प्रकट होती है। इसलिए अब शीघ्र इस कालिय नाग के गर्व को दूर कर दीजिए।" बलरामजी को यह कहते सुनकर यदुवंशी आश्चर्य से हँसने लगे। फिर दीर्घ श्वासों से पेट को हिलाते हुए भगवान् हलधर प्रगाढ़ निद्रा में लौट गए। यह प्रेम में स्वप्न का उदाहरण है।
बोध किसी भक्त का उद्गार है, "तमोगुण को जीत कर मैं ज्ञानरूपी दीपिका को प्राप्त हो गया हूँ और अब केवल परमानन्दकन्द श्रीभगवान् को खोज रहा हूँ।" यह प्रेम में होने वाला बोध है। अविद्या को पूर्ण रूप से विजय कर लेने पर ही दिव्य प्रबोध हो सकता है। उस अवस्था में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि का संग होने पर भक्त भगवान् की दिव्य सत्ता का ही अनुभव करता है। ऐसे में आँखों का खेलना, रोमांच, अधर फड़कना, निद्राभंग आदि लक्षण दीर्घकाल तक विद्यमान रहते हैं। जब राधारानी ने श्रीकृष्ण को सर्वप्रथम देखा तो उन्हें तुरन्त सम्पूर्ण दिव्य सुख की अनुभूति हुई और शरीर के नाना अंग स्तम्भित हो गए। जब ललिता सखी ने उनके कान में कृष्णनाम की ध्वनि की तो उनकी आंखें खुल गईं। यह कृष्णनाम के श्रवण से उत्पन्न बोध है। एक दिन हास-परिहास में श्रीकृष्ण ने राधारानी से कहा, "हे प्रिये ! मैं तुम्हारा संग छोड़ने जा रहा हूँ।" यह कहते ही वे कहीं छिप गए। इससे राधारानी को ऐसा दुःख हुआ कि शरीर पर विवर्णता छा गई और वे वृन्दावन की भूमि पर गिर पड़ीं। वे श्वास-व्यापार से शून्यप्रायः हो गईं थीं; परन्तु श्रीकृष्ण की बनमाला की सुगन्ध के पहुँचने पर भावोन्मत्त हो कर फिर उठ बैठीं। यह गन्ध से उद्भूत दिव्य बोध का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को अपने अंग का स्पर्श करते देखकर कोई गोपी कहने लगी, "हे सखि ! मेरा अंग-स्पर्श करता हुआ यह किसका मृदुल करकमल है जो यमुना वन को देखकर हुई मेरी मूर्च्छा को हटाकर पुनः सुखमयी मूर्च्छा ला रहा है ?" यह स्पर्शजनित बोध है। कोई गोपी श्रीकृष्ण से बोली, "हे कृष्ण ! तुम्हारे रासमण्डल से छिप जाने पर अविलम्ब हमारी प्राणप्रिया राधारानी भूमि पर गिर कर अचेत हो गईं। किन्तु तुम्हारे चर्वित पान को जब मैंने उनके मुखारविन्द