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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 380 में से

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पृष्ठ 252

कृष्णप्रेम के अनन्यान्य भाव [ २२५ में रखा तो वे पुलकितांग एवं सचेत हो गईं।" यह रस से उत्पन्न बोध है। एक रात श्रीमती राधारानी स्वप्न में बोल रही थीं, "हे कृष्ण ! मुझसे और अधिक परिहास मत करो। बस, बहुत हुआ। मेरे वस्त्रों को भी मत छुओ। अन्यथा गुरुजनों को तुम्हारी चंचला की सारी कथा सुना दूँगी। इस प्रकार स्वप्न में कहती हुई राधारानी तुरन्त उठ बैठीं और सामने गुरुजनों को देखकर उनका मुख लज्जा से बिलकुल नीचे झुक गया। यह निद्रा-भंग से हुए बोध का उदाहरण है। एक अन्य उदाहरण भी है। श्रीकृष्ण की दूती जैसे ही उनके पास पहुँची कि श्रीमती राधारानी निद्रा से जाग उठीं। इसी प्रकार रात्रि में श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनकर गोपसुन्दरियाँ स्वप्न से तुरन्त उठ बैठीं। इस सन्दर्भ में अतिशय सुन्दर उपमा है। "कमल कभी श्वेत हंसों से घिरा होता है तो कभी श्याम भ्रमरों से, जो मधुसंचय करते हैं। आकाश की गर्जना से हंस तो चले जाते हैं, पर श्याम भ्रमर कमल का रस लेने के लिए मँडराते रहते हैं।" गोपियों की निद्रा श्वेत हंस जैसी है और श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि मानो श्याम भ्रमर के समान है। जब श्रीकृष्ण की वंशी बज उठी तो गोपियों के निद्रारूपी श्वेत हंस भाग गए और वेणुरव रूपी श्याम भ्रमर गोपीसौन्दर्य को भोगने लगा।