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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 380 में से

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पृष्ठ 253

अध्याय ३१ अन्य व्यभिचारिभाव प्रेम के पूर्वोक्त ३३ भाव व्यभिचारि कहलाते हैं। इन सभी में प्रगाढ़ कृष्णप्रेम प्रकट रहता है। उत्तम, मध्यम और अधम—इस प्रकार इनका तीन कोटियों में विभाग किया जा सकता है। प्रेम में दूसरे-दूसरे भी बहुत से व्यभिचारि होते हैं, जैसे मात्सर्य, उद्वेग, दम्भ, ईर्ष्या, विवेक, निर्णय, क्लीवता, क्षमा, धैर्यहीनता, उत्कण्ठा, शोक, संशय, विनय, आश्चर्य, धृष्टता आदि। ये सब भाव ३३ व्यभिचारिभावों में आ जाते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने नाना प्रकार के व्यभिचारिभावों का अतिशय सुन्दर विश्लेषण किया है। किसी दूसरे के उत्कर्ष को देखकर मन में उठने वाली असूया को 'मात्सर्य' कहते हैं। आकाश में बिजली चमकते देखकर प्राप्त त्रास से 'उद्वेग' उत्पन्न होता है। इसलिए त्रास में उद्वेग का अन्तर्भाव समझना चाहिए। अपने यथार्थ मनोभाव को छिपाना 'अवहित्था' कहलाता है। अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करता 'दम्भ' कहलाता है; अतः दम्भ को अवहित्था के अन्तर्गत माना जा सकता है। किसी दूसरे द्वारा किए अपराध को न सहना 'अमर्ष' है और दूसरे के ऐश्वर्य के प्रति असहिष्णुता 'ईर्ष्या' है। अतः ईर्ष्या अमर्ष में अन्तर्भूत हो जाती है। किसी शब्द का यथार्थ अर्थ स्थापित करना 'निर्णय' कहलाता है। इसके लिये 'विवेक' अपेक्षित है। अतः मति में दोनों विवेक और निर्णय का अन्तर्भाव है। अपने को अज्ञ बताना दैन्य है और उत्साह का अभाव 'क्लीवता' कहलाता है। इसलिए दैन्य में क्लीवता आ जाती है। मन की स्थिरता धृति कही जाती है; इसमें 'क्षमा' का अन्तर्भाव है। 'आश्चर्य' और 'उत्कण्ठा' औत्सुक्य के भीतर आ जाते हैं। किसी अपराध के लिए ग्लानि होने पर लज्जा आती है। इस प्रकार 'विनय' लज्जा में आ जाती है। 'संशय' वितर्क का ही एक रूप है। 'धृष्टता' के बाद चपलता का प्रदर्शन होता है, अतः धृष्टता चपलता में आ जाती है।