भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य व्यभिचारिभाव [ २२७ जब प्रेम में ये सभी भाव प्रकट रहते हैं तो उन्हें 'संचारिभाव' कहते हैं। ये सब भाव दिव्य हैं और नाना परिस्थितियों में परस्पर अनुभाव और विभाव के रूप में प्रकट होते हैं। इनके द्वारा ही प्रेमी-प्रियतम में प्रेम का विनिमय होता है। ईर्ष्या अथवा निन्दा के कारण विवर्णता होती है। इससे भी विभाव माना जा सकता है। कभी-कभी सम्मोह, मूर्च्छा तथा तीव्र उद्वेग भी विभाव माने जाते हैं। प्रेम में प्रकट इन नाना भावों को विविध वर्गों में गिना जा सकता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि त्रास, निद्रा, श्रम, आलस्य, मदिरा से उत्पन्न मद को कभी-कभी संचारिभाव कहा जाता है। इसका कारण गाढ़ रति है। वितर्क, मति, निर्वेद, धृति, स्मृति, हर्ष, बोध, दैन्य, स्वप्न भी प्रेम के विभाव हैं। संचारिभाव परतन्त्र और स्वतन्त्र—दो प्रकार के कहे गए हैं। परतन्त्र भी उत्तम और अधम भेद से दो प्रकार के हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने इनके भेद का निर्णय किया है, जिसे यथास्थान प्रस्तुत किया जायगा। एक भक्त कह उठा, "ओह ! जिसके नाम को सुनने से ही मेरा शरीर और रोम-रोम नाच उठता है, उस मथुरामण्डल को न देख सकने के कारण हाय मेरे नेत्र व्यर्थ ही हैं।" इस वाक्य से मथुरा-दर्शन की तीव्र उत्कण्ठा प्रकट होती है, जिसका उदय गाढ़ कृष्णरति से होता है। भीम के वचन में श्रीकृष्ण के लिए यह प्रगाढ़ रति व्यक्त है—"मेरे वज्रतुल्य बाहुओं को धिक्कार है, जो माधव पर आक्षेप करने वाले इस दुष्ट शिशुपाल को पीस नहीं डालते हैं।" यहाँ भीम के क्रोध से उत्पन्न निर्वेद श्रीकृष्ण में दृढ़ रति का कारण बना है। जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण के उस विश्वरूप को देखा, जिसके कराल दाँत ब्रह्माण्ड के अस्तित्व को ही समाप्त-प्रायः कर कहे थे, तो उसका मुख सूख गया। उसे अपनी सुधी नहीं रही और न यह स्मरण रहा कि वह श्रीकृष्ण का सखा है, यद्यपि वह सदा श्रीकृष्ण की कृपा पर ही आश्रित था। यह अधम (अवर) परतन्त्रता का उदाहरण है। कभी-कभी घोर क्रियाएँ भी कृष्णप्रेम का वर्धन करती हैं। प्रेम में अनुभव होने वाला यह भय मोह के कारण होता है। श्रीमद्- भागवत (१०.२३.४०) में याज्ञिक ब्राह्मणों ने कहा है "हमें जन्म से तीन सुविधायें मिली थीं। सबसे पहले हमारा जन्म ब्राह्मण-कुल में