भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हुआ; फिर हमारा यज्ञोपवीत-संस्कार हुआ और सद्गुरु से विधिवत् दीक्षा भी प्राप्त हुई। परन्तु हाय ! इस सब के होते हुए भी हमें धिक्कार है। हमारे ब्रह्मचर्यव्रत को भी धिक्कार है।'' इस प्रकार ब्राह्मण स्वयं अपनी क्रियाओं को धिक्कारने लगे। उन्हें अनुभूति हुई कि जन्म, विद्वत्ता और संस्कृति में निपुण होने पर भी वे माया-शक्ति के वश में हो रहे थे। उन्होंने यह भी माना कि बड़े-बड़े योगी भी भगवान् की भक्ति के अभाव में माया की आधीनता में ही पड़े रहते हैं। कर्मकाण्डी ब्राह्मणों का यह निर्वेदभाव कृष्णरति से शून्य है। इसके अतिरिक्त निर्वेद का एक रत्यनुस्पर्शी व्याभिचारिभाव भी है, जिसमें श्रीकृष्णरति रहती है । अरिष्टासुर का आक्रमण होने पर गोपांगनाएँ पुकार उठीं—"हे कृष्ण ! बचाओ ! हमें बचाओ ।'' निर्वेद के इस भाव में कृष्णरति है। श्रीकृष्ण के हाथों केशी दैत्य का वध हुआ जानकर कंस में निर्वेद जाग उठा। वह कहने लगा—"रणविद्या को न जानने वाले इस·अशिक्षित और असभ्य अभीर के बालक ने मेरे प्राणप्रिय केशी दैत्य को मार डाला है। इसलिए अब राजा इन्द्र को भी जीत लेने वाले मुझ कंस का जीना निरर्थक है।'' इस निर्वेद के भाव में कृष्ण-विषयक रति की गन्ध अभिव्यक्त होती है, इसलिये यह रतिगन्धी व्यभिचारिभाव माना जाता है। एक बार अक्रूर को डाँटते हुए कंस बोला—"अरे मूर्ख ! कालिय जैसे निर्विष सर्प को हराना कौन बड़ी बात है जो तू उस गोप-बालक को आदिदेव जगदीश बता रहा है। उसने गोवर्धन जैसे ढेले को उठा लिया तो क्या ? इससे कहीं अधिक आश्चर्य तो इस बात का है कि तू उसे भगवान् कहता है।" यह कृष्णप्रेम के निर्वेदभाव से होने वाली असूया जनित विपथा-वृत्ति है । कदम्ब का कोई वृक्ष विलाप कर रहा था कि, "जिसकी छाया तक को श्रीकृष्ण ने स्पर्श नहीं किया, ऐसे मेरे जन्म को धिक्कार है।" भक्त उसे सान्त्वना देता हुआ कह रहा है—"हे कदम्ब ! तुम शोक न करो ! कालिय-मर्दन करते ही श्रीकृष्ण यहाँ आकर तुम्हारी अभिलाषा को पूरा करेंगे।" विष्णुवाहन गरुड़जी एक समय कह रहे थे—"मुझ जैसा परमपवित्र, कुशल और निपुण दूसरा और कौन होगा ? वे मुझे प्रिय न समझें, मेरे संग में न आना चाहें, पर फिर भी मेरे पंखों का उपयोग तो वे करेंगे ही।'' यह प्रेम के शान्तभाव में निर्वेद का उदाहरण है।