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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

२२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हुआ; फिर हमारा यज्ञोपवीत-संस्कार हुआ और सद्गुरु से विधिवत् दीक्षा भी प्राप्त हुई। परन्तु हाय ! इस सब के होते हुए भी हमें धिक्कार है। हमारे ब्रह्मचर्यव्रत को भी धिक्कार है।'' इस प्रकार ब्राह्मण स्वयं अपनी क्रियाओं को धिक्कारने लगे। उन्हें अनुभूति हुई कि जन्म, विद्वत्ता और संस्कृति में निपुण होने पर भी वे माया-शक्ति के वश में हो रहे थे। उन्होंने यह भी माना कि बड़े-बड़े योगी भी भगवान् की भक्ति के अभाव में माया की आधीनता में ही पड़े रहते हैं। कर्मकाण्डी ब्राह्मणों का यह निर्वेदभाव कृष्णरति से शून्य है। इसके अतिरिक्त निर्वेद का एक रत्यनुस्पर्शी व्याभिचारिभाव भी है, जिसमें श्रीकृष्णरति रहती है । अरिष्टासुर का आक्रमण होने पर गोपांगनाएँ पुकार उठीं—"हे कृष्ण ! बचाओ ! हमें बचाओ ।'' निर्वेद के इस भाव में कृष्णरति है। श्रीकृष्ण के हाथों केशी दैत्य का वध हुआ जानकर कंस में निर्वेद जाग उठा। वह कहने लगा—"रणविद्या को न जानने वाले इस·अशिक्षित और असभ्य अभीर के बालक ने मेरे प्राणप्रिय केशी दैत्य को मार डाला है। इसलिए अब राजा इन्द्र को भी जीत लेने वाले मुझ कंस का जीना निरर्थक है।'' इस निर्वेद के भाव में कृष्ण-विषयक रति की गन्ध अभिव्यक्त होती है, इसलिये यह रतिगन्धी व्यभिचारिभाव माना जाता है। एक बार अक्रूर को डाँटते हुए कंस बोला—"अरे मूर्ख ! कालिय जैसे निर्विष सर्प को हराना कौन बड़ी बात है जो तू उस गोप-बालक को आदिदेव जगदीश बता रहा है। उसने गोवर्धन जैसे ढेले को उठा लिया तो क्या ? इससे कहीं अधिक आश्चर्य तो इस बात का है कि तू उसे भगवान् कहता है।" यह कृष्णप्रेम के निर्वेदभाव से होने वाली असूया जनित विपथा-वृत्ति है । कदम्ब का कोई वृक्ष विलाप कर रहा था कि, "जिसकी छाया तक को श्रीकृष्ण ने स्पर्श नहीं किया, ऐसे मेरे जन्म को धिक्कार है।" भक्त उसे सान्त्वना देता हुआ कह रहा है—"हे कदम्ब ! तुम शोक न करो ! कालिय-मर्दन करते ही श्रीकृष्ण यहाँ आकर तुम्हारी अभिलाषा को पूरा करेंगे।" विष्णुवाहन गरुड़जी एक समय कह रहे थे—"मुझ जैसा परमपवित्र, कुशल और निपुण दूसरा और कौन होगा ? वे मुझे प्रिय न समझें, मेरे संग में न आना चाहें, पर फिर भी मेरे पंखों का उपयोग तो वे करेंगे ही।'' यह प्रेम के शान्तभाव में निर्वेद का उदाहरण है।

अन्य व्यभिचारभाव [ २२६ भाव के लक्षणों के कभी-कभी उत्पत्ति, सन्धि, शबलता और शान्ति रूप चार वर्ग किए जाते हैं। एक दिन श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानी से कहने लगे, "जब तुमने प्रातः एकान्त में मुझसे मिलने की चेष्टा की तो तुम्हारी सखी मेखला ईर्ष्यावश भूखी ही रही। उसे देखो तो।" श्रीकृष्ण के इस परिहास को सुनकर राधारानी अपनी भौंहों को टेढ़ा घुमाने लगीं। रूप गोस्वामी की प्रार्थना है कि राधारानी के इस भ्रू-नर्तन से सब का कल्याण हो। इस भाव में असूया के उदय का उदाहरण है। एक रात पूतना के मृत शरीर पर बालकृष्ण को खेलता देखकर माँ यशोदा कुछ समय के लिये निश्चलदेह रह गई। यह दो भावों की सन्धि का उदाहरण है। ऐसी सन्धि इष्ट-अनिष्ट—दोनों में से कोई भी हो सकती है। पूतना का मरना इष्ट था; परन्तु आधी रात में अकेले बालकृष्ण का उसके वक्ष पर खेलना अनिष्ट की आशंका को जन्म दे रहा था। इस प्रकार यशोदा इष्ट और अनिष्ट के बीच पकड़ी गयीं। जब कृष्ण ने चलना सिखा ही था कि वे बार-बार घर के बाहर जाते और फिर अन्दर आते। इस पर यशोदा ने आश्चर्य से कहा; यह बालक बहुत ही चंचल है और किसी से भी नहीं डरता। बार-बार वृन्दावन के अड़ौस-पड़ोस में जाता है और फिर वापस घर में लौट आता है। यह बिल्कुल निडर है, परन्तु फिर भी मुझे भय लगता है कि यह कहीं किसी संकट में न पड़ जाये। यह एक ही कारण से उत्पन्न दो परस्पर भिन्न व्यभिचारिभावों की सन्धि का उदाहरण है। बालक अत्यन्त निडर था; परन्तु फिर भी यशोदा को संकट का भय लग रहा था। इसमें हर्ष और शंका दो अलग-अलग हेतु हैं। भाव यह है कि बालक को बार-बार अन्दर बाहर आता देखकर यशोदा को हर्ष भी हो रहा था और भय की शंका भी हृदय में उठ रही थी। जब देवकी ने अपने पुत्र कृष्ण के प्रसन्नवदन को कंस की रंगशाला में पहलवानों के सम्मुख देखा, तो उसके नेत्रों से ठंडे और गरम दोनों प्रकार के आँसू एक साथ विगलित होने लगे। यह दो अलग कारणों से उत्पन्न हर्ष और शोक की सन्धि है। एक समय जब श्रीमती राधारानी वृन्दावन में यमुना के तीर पर खड़ी थीं तो श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने परिरंभम में पकड़ लिया। श्रीकृष्ण ने ऐसा बलपूर्वक किया था। यद्यपि राधारानी ने इसके लिये बाहर अप्रसन्नता व्यक्त की; परन्तु अपने अन्तर में वे मुस्करा रही थीं और उन्हें अतिशय

२३० ] भक्तिरसामृतसिन्धु तृप्ति का अनुभव हो रहा था। फिर भी उन्होंने बाहरी रूप से अपनी भौंहों को टेढ़े करते हुये ऐसा दिखाया मानो श्रीकृष्ण को त्याग रही हों। ऐसी मनोदशा में वृषभानुनन्दिनी राधारानी का सौन्दर्य खिल उठा और रूप- गोस्वामी ने उसकी जय-जयकार की। इसमें भी नाना भावों की सन्धि है; पर केवल एक कारण हैं--श्रीकृष्ण। कभी-कभी नन्दमहाराज के आवास में बड़े-बड़े महोत्सवों का आयोजन होता, जिनमें सारे वृन्दावनवासी सम्मिलित होते। ऐसे ही एक अवसर पर राधारानी को वह स्वर्ग का हार पहने देखा गया जो उन्हें श्रीकृष्ण ने उपहार में दिया था। माता यशोदा और राधारानी की माता ने भी यह बात तुरन्त जान ली, क्योंकि वह हार राधारानी के कंठ के लिये बहुत लम्बा था। इसके अतिरिक्त उस समय राधारानी को अपने समीप श्रीकृष्ण दिख रहे थे और अपना पति अभिमन्यु भी दृष्टिगोचर था। एक साथ इन सब कारणों से राधारानी को बड़ी लज्जा हुई और उनका मुखमण्डल परिम्लान हो चला। ऐसी अवस्था में वे बड़ी सुन्दर लग रही थीं। यहाँ लज्जा, अमर्ष, हर्ष और विषाद की सन्धि है। इस प्रकार यह अनेक हेतुओं से उत्पन्न अनेक भावों की सन्धि का उदाहरण है। कंस कह रहा था, 'अरे यह अभीर का लड़का मेरा क्या कर सकता है?' दूसरे क्षण जब उसे सूचित किया गया कि उसके सारे असुर मित्र उस बालक द्वारा मार दिये गये हैं, तो कंस चिंतित होकर विचारने लगा, “तो फिर जाकर जल्दी से उसकी शरण स्वीकार कर लूं।" तभी उसे विचार हुआ, "मैं उससे क्यों डरूँ। मेरी सहायता के लिये अभी बहुत पहलवान बचे हुये हैं।" और फिर दूसरे क्षण वह सोचने लगा, "यह बालक निश्चित रूप से सामान्य नही है, क्योंकि उसने गोवर्धन पर्वत को अपने उल्टे हाथ से उठा लिया था। अतएव इस सम्बन्ध में मुझे क्या करना चाहिये। अच्छा तो मैं स्वयं आज ही वृन्दावन में जाकर वहाँ के निवासियों का नाश कर डालूँ। परन्तु मैं बाहर भी नहीं जा पाता, मेरा हृदय इस बालक के भय से काँप रहा है।" कंस की इस मनोदशा में गर्व, विषाद, दैन्य, मति, स्मृति, शंका, अमर्ष और त्रास-इन आठ भावों की सबलता पाई जाती है। वास्तव में कंस की मनोदशा इन आठों भावों से तूर्ण थी। एक गृहस्थ भक्त ने कहा है, "हे नाथ मैं इतना अधम हूँ, इतना मन्दभाग्य हूँ कि यह दोनों आँखें कीर्तिमयी मथुरा नगरी को देखने की इच्छा कभी नहीं करतीं। इसलिये मेरी इन आंखों को धिक्कार है। मैं बहुत विद्वान् माना जाता हूँ, परन्तु मेरी सारी विद्वत्ता का उपयोग केवल

अन्य व्यभिचारिभाव [ २३१

राजसेवा से हुआ है। मैंने बलि काल के विषय में नहीं सोचा, जो सबसे प्रबल है और सबको रचता और नष्ट करता है। मैं किसके लिए यह सब धन और वैभव छोडूंगा ? मैं जीर्ण-क्षीण होता चला जा रहा हूँ। अब क्या करूंगा ? तो फिर घर में ही रहकर भगवान् का भजन करूँ। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मन को तो वृन्दावन हठात् अपनी ओर खींच रहा है।" इस उदाहरण में निर्वेद, गर्व, शंका, धृति, विषाद, मति और उत्सुकता—इन सात भावों की शबलता है। संस्कृत में उक्ति है कि 'नैराश्यं परं सुखम्,' अर्थात् जब भावुकता अथवा अभिलाषा इतनी बढ़ जाये कि निराशामय कष्टों के बिना उसकी शान्ति न हो सके तो उनका असफल रह जाने में ही सुख है। एक बार वृन्दावन में श्रीकृष्ण को खोजते-खोजते गोप बालक खिन्न वदन हो गये थे। तभी उन्हें पहाड़ के ऊपर श्रीकृष्ण का मधुर वंशीरव सुनने को मिला। इससे वे आनन्द में मग्न होकर नाचने लगे। यह अत्यारूढ भाव के विलय, अर्थात् शान्ति का उदाहरण है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि यद्यपि उनकी वाणी में शब्द, अर्थ और रसों का कोई चमत्कार नहीं हैं; फिर भी उन्होंने नाना प्रकार के प्रेम में होने वाले भावों का उदाहरण देने का प्रयास किया है। वे आगे कहते हैं कि ३३ व्यभिचारी भाव और ८ अन्य भाव, ये कुल ४१ 'मुख्यभाव' नाम से कहे जाते हैं। इन भावों से शरीर और इन्द्रियों, दोनों में विकार होते हैं। इन सबको हृदय में उठने वाले नाना प्रकार के भाव माना जा सकता है। कोई भाव स्वाभाविक होता है और कोई भाव आगन्तुक होता है। स्वाभाविक भाव भक्त के बाहर-भीतर निरन्तर बने रहते हैं। जैसे वस्त्र को देखकर, वह किस रंग में रंगा गया है, यह जाना जा सकता है; उसी प्रकार इन भावों के लक्षणों के ज्ञान से यथार्थ स्थिति का बोध हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णरति एक ही है; परन्तु भक्त नाना प्रकार के होते हैं। इसलिये इस प्रकार की रति भी नाना रूपों में अभिव्यक्त होती है। जैसे लाल रंग में रंगा वस्त्र लाल प्रतीत होता है; उसी प्रकार किसी भी आगन्तुक भाव को उसके विशिष्ट लक्षणों से जाना जा सकता है। वास्तव में भक्तों के सभी भिन्न-भिन्न रस और भाव चित्त में विशिष्ट-विशिष्ट प्रकार की वृत्तियों को जन्म देते हैं और तीन भेदों के अनुसार प्रेम के लक्षण नाना रूपों और मात्राओं में प्रकट होते हैं। यदि चित्त गरीष्ठ है, गम्भीर है और महीष्ठ है तो प्रेम के एक प्रकार के लक्षण प्रकट होंगे और यदि हृदय कर्कश है, क्रूर है तो भिन्न

२३२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु लक्षण अभिव्यक्त होंगे। भाव के लक्षण हृदय की स्थिति के अनुसार ही होते हैं। सामान्यतया लोग मन की नाना वृत्तियों को ही नहीं समझ सकते; परन्तु जब हृदय अत्यन्त मृदु एवं नम्र हो जाता है तो ये लक्षण बड़ी सुगमता से दृश्मान हो जाते हैं और इन्हें स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। गरीष्ठ हृदय स्वर्ण के समान है। गम्भीर हृदय समुद्र के समान है। महीष्ठ हृदय नगर के समान है। मृदु एवं नम्र हृदय रूई के समान है। हृदय में भाव की विद्युत् तरंग उठने पर स्वर्ण जैसे अथवा गम्भीर हृदय में क्षोभ नहीं होता; परन्तु कोमल और मृदु हृदय एकदम क्षुब्ध हो उठता है। इसे एक और उदाहरण से समझा जा सकता है। गम्भीर और उदार हृदय जहाँ एक महानगर के समान है, वहीं कोमल हृदय क्षुद्र कुटिया जैसा है। महानगर में बड़े-बड़े दीप, महाबलशाली हाथी आदि रहते हैं। परन्तु उन पर कोई विशेष ध्यान नहीं देता। यही दीप अथवा हाथी जब किसी क्षुद्र कुटिया के पास हों तो तुरन्त दिखलाई दे जाते हैं। कर्कश चित्त तीन प्रकार का कहा गया है—वज्र के समान, स्वर्ण के समान और लाख के समान। वज्र बड़ा बलशाली होता है, कभी कोमल नहीं पड़ता। उसी प्रकार जो उग्र तप-त्याग में संलग्न हैं, वे सुगमता से द्रवित नहीं हो सकते। उग्र ताप से स्वर्ण पिघल जाता है; इसी प्रकार स्वर्ण के समान कर्कशचित्त अत्यन्त तीव्र भाव रूप अग्नि से पिघल जाता है। लाख के समान हृदय तो थोड़े ही ताप से बिल्कुल सरलता से पिघल जाता है। मृदु अथवा कोमल चित्त मोम, मक्खन तथा अमृत के समान तीन प्रकार का माना जाता है। इन तीनों प्रकार के कोमल चित्त में भाव को सूर्य की उपमा दी जा सकती है। मोम और नवनीत को पिघलाने के लिये थोड़ा सा सूर्यताप भी पर्याप्त होता है। इसी प्रकार कोमलचित्त पुरुष बड़ी सरलता से द्रवित हो जाते हैं। परन्तु अमृत तो स्वभावतः द्रवीभूत अवस्था में रहता है। इसलिये जिन्हें श्रीकृष्ण का शुद्ध प्रेमभाव प्राप्त है, वे स्वभावतः अमृत के समान सदा द्रवित रहते हैं। श्रीकृष्ण के शुद्धभक्त में सदा अमृत के समान गुण रहते हैं और कभी-कभी मक्खन और मोम के गुण भी पाये जाते हैं। सारांश में, उपरोक्त किसी भी भाववृत्ति वाले हृदय को विशिष्ट परिस्थितियों में द्रवित किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार जैसे रसायनों के विशेष सम्मिश्रण से कठोर हीरा भी पिघल जाता है। 'दानकेलिकौमुदी' में उल्लेख है, "जब भक्त के हृदय में प्रेम का उदय होता है तो वह अपने

अन्य व्यभिचारिभाव [ २३३ भाव-विकारों को रोकने में उसी प्रकार असमर्थ हो जाता है, जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय होने पर समुद्र अपने विकारों को रोक नहीं पाता। समुद्र स्वाभाविक रूप में निरन्तर गम्भीर और अचल बना रहता है; परन्तु जब चन्द्रोदय होता है तो समुद्र के वेग को कोई नहीं रोक सकता। इसी प्रकार जो शुद्धभक्त हैं, वे किसी भी कारण से अपने आन्तरिक भावविकारों को नहीं दबा सकते।

अध्याय ३२ स्थायिभाव के लक्षण जो भाव प्रेम की सब क्षणिक अभिव्यक्तियों को और प्रेम के विरुद्ध भावों को दबा कर निरन्तर शक्तिशाली राजा के समान विराजित होता है, वह स्थायिभाव कहलाता है। यह भाव मुख्य और गौण दोनों प्रकार से अभिव्यक्त हो सकता है। इसलिए कृष्णविषया रति को मुख्या और गौण, ऐसा दो प्रकार का कहा गया है। शुद्धसत्त्व में स्थिर हो जाने पर ही इस कृष्णरति के भावों का उदय हो सकता है। मुख्यारति के भी दो भेद हैं—स्वार्था और परार्था । जब भाव के अविरुद्ध लक्षण स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होते हैं तो किसी विरुद्ध भाव की अभिव्यक्ति से ग्लानि होती है। ऐसी रति को स्वार्था कहते हैं। जिस रति में अविरुद्ध और विरुद्ध भावों का परस्पर सामंजस्य हो सकता है, उसे मुख्या परार्था रति कहते हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, और माधुर्य—इस प्रकार ये मुख्या परार्था रति के पाँच भेद हैं। यह रति प्रेम के पात्रों के वैशिष्ट्य के अनुसार अनेक भेदों को प्राप्त होती है। शान्त शुद्धा रति के सामान्या, स्वच्छा, और शान्त—ये तीन विभेद हैं। किसी विशेषता को प्राप्त हुये बिना सामान्य व्यक्तियों अथवा बालकादि द्वारा अभिव्यक्त रति सामान्या है। यह कदाचित् अंगों के कंपन और नेत्रों की विवर्णता अर्थात् नेत्रों का लाल हो जाना, सफेद हो जाना इत्यादि लक्षणों के रूप में प्रकट होती है। इस रति का कोई विशेष लक्षण नहीं है। कोई नवयुवक किसी वृद्ध से कह रहा है—'हे वृद्ध देखो ! यह तीन वर्ष की बालिका भी सामने खड़े श्रीकृष्ण को देखकर आनन्द में भरकर हुंकार करती हुई उनके पास पहुँचने के लिए आगे की ओर दौड़ रही है। देखो

स्थायिभाव के लक्षण [ २३५ तो।" यह बालिका के हृदय में सामान्या रति का उदाहरण है जिसके अपने कोई विशेष लक्षण नहीं होते। श्रीकृष्ण के प्रति नाना प्रकार की रति के अनुसार भक्तों के अनेक भेद हैं। उनके लक्षण रत्नों के समान ही स्फुट रूप से प्रकाशित हैं। कहा जाता है कि एक महाभागवत ब्राह्मण कभी-कभी भगवान् को अपना प्रभु मानकर उनकी स्तुति करता। कभी मित्र के समान परिहास करता। कभी वात्सल्यप्रेम से भरकर उनकी रक्षा करता। कभी अपना प्रिय समझकर उन्हें पुकारता। और कभी कभी परमात्मा मानकर हृदय में उनका ध्यान करता। इस प्रकार ब्राह्मण ने अपनी भाव रति को नाना अवसरों पर नाना प्रकार से व्यक्त किया है। परन्तु निरन्तर कृष्णरति में डूबा होने से वह सब अवस्थाओं में परमानन्द में निमज्जित रहा और शुद्ध प्रेम में स्थित हो गया। इस प्रकार वह स्वच्छ माध्यम था, ठीक उस रत्न के समान जो अपनी प्रकृति के अनुसार नाना रंग दिखाता है। देवर्षि नारद को अपनी वीणा पर भगवान् की लीला का गुणगान करते सुनकर ब्रह्म में लीन चारों कुमारों को भी शरीर में कंप हो चला। एक भक्त पुकार उठा—"यद्यपि केवल भक्तों की सेवा करने से ही मेरी मुक्ति हो सकती है। परन्तु फिर भी मेरा चित्त उन श्रीभगवान् के दर्शनों के लिये बड़ा आतुर हो रहा है जो नवोनित घनश्याम वर्ण हैं।" भक्त में भगवान् के सान्निध्य की ऐसी लालसा को शान्तरति का लक्षण माना जा सकता है। केवला और संकुला रति सामान्यतः कृष्णभक्तों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। सर्वप्रथम वे भक्त हैं जो निरन्तर पूर्ण रूप से श्रीभगवान् की कृपामय स्नेह पर निर्भर रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वे भक्त हैं जिनका श्रीकृष्ण से सखाभाव का सम्बन्ध है। अन्तिम श्रेणी में वे भक्त आते हैं जो श्रीकृष्ण के साथ वात्सल्य प्रेम का सम्बन्ध रखते हैं, अर्थात् जो श्रीकृष्ण के पूज्य हैं। इन तीनों प्रकार के भक्तों का श्रीकृष्ण से भिन्न- भिन्न रसों में सम्बन्ध विकसित होता है। जब कृष्णविषया रति केवल एक रस पर आधारित हो तो उसे केवला कहते हैं। इस प्रकार की केवला रति वाला भक्त क्रमशः श्रीकृष्ण के रसाल जैसे किसी एक नित्य पार्षद जो गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण का निजी सेवक है अथवा श्रीदामा और सुदामा जैसे मित्रों अथवा नन्द यशोदा जैसे वात्सल्य मित्रों के चरणचिह्नों

२३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की अनुगति की लालसा स्फुरित होती है। कृष्णविषयारति सीधे श्रीकृष्ण के लिए कभी अभिव्यक्त नहीं होती। इसके लिए गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण के किसी नित्य पार्षदों के चरणचिन्हों की अनुगति आवश्यक है। जब कृष्णविषयक रस आपस में मिल जाते हैं—जैसे सख्य, दास्य, और वात्सल्य का परस्पर मिल जाना, तो परिणाम में होने वाली रति को संकुला रति (स्वाद) कहते हैं। ऐसे मिश्रित स्वाद उद्धव भीम, मुखरा नामक यशोदा मैय्या की धात्री आदि भक्तों में उदित होते हैं। संकुलारति में भी किसी एक रस का निरन्तर प्राधान्य रहता है। उसी प्रधान रस को भक्त का श्रीकृष्ण से मुख्य सम्बन्ध माना जाता है। उदाहरण के लिए उद्धव का श्रीकृष्ण से सख्यभाव है। परन्तु उद्धव के चरित्र में श्रीकृष्ण के लिए दास्यभाव भी दृष्टिगोचर होता है। इसका नाम सम्भ्रम सख्यभाव है। दूसरी ओर श्रीदामा और सुदामा जैसे सखाओं द्वारा अभिव्यक्त सखाभाव सम्भ्रम से बिल्कुल रहित है। प्रीति जो भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण को आराध्य मानते हैं वे कृष्ण के अनु- ग्राह्य माने जाते हैं। उनकी रति प्रीति कहलाती है। ऐसे भक्त को श्रीकृष्ण के प्रति अपनी आधीनता बड़ी प्रधान रहती है और इसलिये वह कदाचित् ही किसी अन्य रस में रुचि लेता है। मुकुन्दमाला में राज कुलशेखर कहते हैं—"हे प्रभो ! आप जीवों का संसार रूपी नरक से उद्धार करने वाले हैं परन्तु अपने विषय में मुझे यह चिन्ता नहीं। मुझे चाहे स्वर्ग में रहना हो अथवा पृथ्वी पर अथवा चाहे नरक में ही क्यों न भेज दिया जाये मेरे लिये इसका कोई महत्त्व नहीं। मेरी केवल इतनी ही अभिलाषा है कि शरत् कालीन कमलों के समान सुन्दर आपके चरणों का ध्यान मरते समय भी मैं करता रहूँ।" सख्य जहाँ तक सख्य का सम्बन्ध है, जो उच्च कोटि के भक्त श्रीकृष्ण के प्रायः तुल्य हैं वे भगवान् से सख्यभाव के सम्बन्ध में अधिकारी माने जाते हैं, सख्यभाव के स्तर पर नाना प्रकार के परिहास, अट्टहास आदि होते हैं। इस प्रकार के सख्य सम्बन्ध का एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में है जहाँ श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं—"गोचारण के समय मेरे आज सुन्दर

स्थायिभाव के लक्षण [ २३७ कानन में पुष्प चयन के लिये चले जाने पर मेरे वे मित्र गोपबालक क्षण भर के लिये मेरे विरह को न सह सके। इसलिये जब उन्होंने मुझे ढूँढ निकाला तो पहले मैं, पहले मैं, यह कहकर उन्होंने स्पर्धा पूर्वक मुझे स्पर्श करते हुये आलिंगन किया।" एक मित्र ने श्रीकृष्ण को फटकारते हुए कहा, "हे दामोदर ! यद्यपि श्रीदामा ने तुम्हें हराकर तुम्हारे अभिमान को चूर-चूर कर दिया है परन्तु फिर भी बल के मिथ्या दम्भ से अपनी इस लज्जा जनक पराजय को छिपाने का प्रयास कर रहे हो।" वात्सल्य जब माता यशोदा ने सुना कि श्रीकृष्ण की गायों को कंस के बलशाली सेवक बलात् हरकर लिये जा रहे हैं और बेचारे गोपबालक अपनी गायों की रक्षा का प्रयास कर रहे हैं तो वे सोचने लगीं, "मैं इन निरीह बालकों को कंस के सेवकों के आक्रमण से कैसे बचाऊँ?" यह भक्त के वात्सल्य भाव का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को वन से गोचारण करके लौटता देखकर प्रेम से द्रवित हुई माता यशोदा तुरन्त उनके कपोलों को अपनी अंगुलियों से छूते हुए प्यार करने लगीं। माधुर्य श्रीकृष्ण और उनके माता-पिता में पाई जाने वाली वात्सल्यरति से भी ऊपर मधुरारति है। श्रीकृष्ण और गोपांगनाएँ कटाक्ष, भ्रू-विलास, प्रियवाणी, और स्मितादि के द्वारा इसे अभिव्यक्त करते हैं। 'गोविन्दविलास' में एक वाक्य है—"श्रीमती राधारानी बड़ी ही उत्कंठा से श्रीकृष्ण का अन्वेषण कर रही थीं। उनकी यह उत्कंठा प्रायः निराशा में परिवर्तित हो चली थी।" जब मधुरारति की ऐसी गौण अभि- व्यक्ति होती है तो हास, आश्चर्य, उत्साह, विषाद, क्रोध, भय और कभी कभी जुगुप्सा का भाव भी होता है। इन सातों प्रकार के भावों से गौण रति बनती है। मुख्या मधुरारति में हास, आश्चर्य, उत्साह, विषाद, भय तथा क्रोध तो रहते हैं, परन्तु जुगुप्सा नहीं होती। इन सभी लक्षणों को आनन्दरस का बड़ा निधान माना जाता है। जब ये सात प्रकार के प्रेम बन्ध अभिव्यक्त होते हैं तो वे स्थायित्व को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे मधुरारति का स्वाद बढ़ता है।

अध्याय ३३ भाव के गौण लक्षण हास दो गोपियों के भांडों में से दही की चोरी करने के बाद पकड़े जाने पर श्रीकृष्ण ने अपनी गोपी सखी से कहा, "हे सखि ! हे सुमुखि ! मैं शपथ खाता हूँ कि मैंने तुम्हारे भाँड की दही को देखा तक नहीं है; परन्तु फिर भी तुम्हारी सखी राधारानी निर्लज्जता पूर्वक मेरे मुख की गन्ध को सूंघ रही है। मानो मैंने ही इसकी दही खा ली हो। इसे इस प्रकार के असाधु व्यवहार से रोको ।" श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहने पर राधारानी की सखियाँ अपनी हँसी को रोक नहीं सकीं। यह हासरति का उदाहरण है । विस्मय ब्रह्मा ने देखा कि सारी गायें और सारे गोप-बालक पीताम्बर और नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं। सभी बालक चतुर्भुजधारी थे और सैकड़ों ब्रह्मा उनकी आराधना कर रहे थे ! साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण के साथ होने के कारण उन गोप-बालकों का आनन्द खूब खिल रहा था। उस समय अपने विस्मय में ब्रह्मा कह उठे, "यह सब मैं क्या देख रहा हूँ ?" यह विस्मयरति का उदाहरण है। उत्साहरति शृंग की बनी वंशी की ध्वनि से जिसका आकाश गुंजायमान हो रहा था इस प्रकार की यमुना तट की भूमि पर श्रीकृष्ण के साथ लड़ने के लिये उद्यत गरजते हुए श्रीदामा ने बलपूर्वक अपनी कमर कस ली, अर्थात् लड़ने को कटिबद्ध हो गया । शोकरति श्रीमद्भागवत (१०.७.२५) में आंधी के रूप में आये तृणावर्त

भाव के गौण लक्षण [ २३६

दैत्य द्वारा श्रीकृष्ण के हरण का वर्णन है। श्रीकृष्ण को आकाश में उड़ा जाता देखकर सारी गोपियाँ उच्च-उच्च कंठ से रोने लगीं। नन्द- नन्दन को न देख पाने पर वे माता यशोदा को उपालम्भ देने लगीं। यह शोकरति का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को कालिय नाग से लड़ता देखकर यशोदा मैय्या पुकार उठीं, "मेरा प्राणप्रिय कृष्ण कालिय सर्प की फणों में जकड़ा हुआ है; फिर भी हृदय टुकड़े-टुकड़े नहीं होता। इस शरीर की ऐसी कठोरता को धिक्कार है।" यह भी शोकरति का दृष्टान्त है। क्रोधरति जब अभिमन्यु की माता जटिला ने श्रीकृष्ण को एक रत्नहार पहने देखा तो वह समझ गई कि यह अवश्य उन्हें राधारानी ने भेंट किया है। वह क्रोध से भर गई और टेढ़ी भौंहों से उन्हें घूरने लगीं। यह क्रोधरति का उदाहरण है। जुगुप्सारति यामुनाचार्य जी कहते हैं, "जब से मैं श्रीकृष्ण के साथ नित्य नव- नव रसों का आस्वादन आदान-प्रदान करने लगा हूँ, तबसे अपने पिछले स्त्रीसंग की याद आते ही मेरे होंठ घृणा से सिकुड़ जाते हैं; यहाँ तक कि मैं उस विचार पर ही थूकने लगता हूँ।" यह जुगुप्सारति है। भयरति एक पुराना भक्त कहने लगा, "हे नाथ ! जब हम आपसे दूर होते हैं तो फिर आपके दोबारा दर्शनों के लिये बड़ी उत्कंठा होती है। हमारा जीवन दुःखों से भर जाता है। परन्तु जब आप फिर मिलते हैं तो विरह का भय उपस्थित हो जाता है। अतएव चाहे आप मिलें अथवा न मिलें हमें सदा नाना प्रकार का भय सताया करता है।" यह कृष्णरति में विरोधी भावों के संकुलन का उदाहरण है। ऐसी रति बड़ी ही आस्वाद्य होती है और कुशल रसाज्ञों ने इसे दही, शक्कर और कालीमिर्च के मिश्रण की उपमा दी है। इन सबका सम्मिलित स्वाद बड़ा ही रसमय होता है।

अध्याय ३४ भक्तिरसामृत अलग-अलग भक्तों के हृदय में उदित होने वाले भिन्न-भिन्न विशिष्ट भावों को विभाव कहते हैं । इनके फलस्वरूप प्रकट कटाक्ष, भय, विस्मय, हास आदि पूर्ववर्णित भाव अनुभाव कहलाते हैं । अनुभाव और विभाव को जन्म देने वाले नाना कारण संचारिभाव हैं । जब भी श्रीकृष्णलीला विषयक काव्य अथवा नाटक का आयोजन होता है तो श्रोताओं अथवा दर्शकों में नाना प्रकार के दिव्य सेवाभाव का उदय होता है और वे भिन्न-भिन्न विभाव, अनुभाव और संचारिभावों का आस्वादन करते हैं । जो देहात्मबुद्धि के स्तर पर है वह केवल नाना शास्त्रवचनों के आधार पर भिन्न-भिन्न भाव और अनुभाव का ऐसा वर्णन नहीं करे । इनकी अभिव्यक्ति भगवान् की दिव्य आह्लादिनी शक्ति का कार्य है । बस यह समझना चाहिये कि दिव्य स्तर पर प्रेम का नाना प्रकार से आदान-प्रदान होता है । प्रेम के ऐसे आदान-प्रदान को प्राकृत अथवा लौकिक समझने की भूल कभी न करें। महाभारत उद्योगपर्व में चेतावनी है कि अचिन्त्य वस्तु को तर्क का विषय नहीं बनाना चाहिये । वास्तव में अपनी वर्तमान दशा में वैकुण्ठ जगत् की क्रियाएँ हमारे लिये अचिन्त्य हैं । रूपगोस्वामी जैसे महापुरुषों ने वैकुण्ठजगत् की दिव्य क्रियाओं का संकेत करने का प्रयास अवश्य किया है; परन्तु पूर्ण रूप से ये क्रियाएँ वर्तमान में हमारे चिन्तन से परे ही रहेंगी । श्रीकृष्ण से होने वाले दिव्य सेवाभाव- विनिमय को तभी समझा जा सकता है जब कोई वास्तव में उनकी आह्ला- दिनी शक्ति के संस्पर्श में स्थित हो जाये । इस सन्दर्भ में रूपगोस्वामी आकाश के मेघों का उदाहरण देते हैं— आकाश में मेघ सागर से उठते हैं और बरस जाने पर उनका जल दुबारा नीचे गिरकर सागर को लौट जाता है । इस प्रकार सागर के समान ही श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है । शुद्धभक्त रसधारी मेघ है और जब

भक्तिरसामृत [ २४१ वह दिव्य प्रेममयी सेवा से परिपूर्ण हो जाता है तो परिवर्षण के रूप में अपनी कृपा को बरसाता है और क्रमशः आह्लादिनी शक्ति कृष्णरूप सागर को लौट जाती है। कृष्णभक्तिरस : मुख्य और गौण भक्तियोग से मिलने वाले दिव्य आनन्द रस के दो भेद हैं—मुख्य भक्तिरस और गौणभक्तिरस। मुख्यभक्तिरस पाँच प्रकार का है और गौणभक्तिरस के सात दिव्य प्रकार हैं। मुख्यभक्तिरस के भेद हैं—शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। गौणभक्तिरस के भेद हैं—हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स। इस प्रकार मुख्य और गौण दोनों को मिलाकर भक्तिरस कुल बारह प्रकार का होता है। इन सबका अलग-अलग वर्ण माना गया है। ये क्रमशः इस प्रकार हैं—श्वेत, चित- कबरा, अरुण, शोण, श्यामवर्ण, कपोत, पीत, गौर, धूम्र, रक्त, कृष्ण तथा नील। बारह दिव्य रसों के अधिष्ठाता, बारह अलग-अलग अवतार हैं— कपिल, माधव, उपेन्द्र, नृसिंह, नन्दनन्दन, बलराम, कूर्म, कल्की, राघव, भार्गव, वराह, तथा मत्स्य। पूति, विकास, विस्तार, विक्षेप, और विक्षोभ—प्रेम के आदान- प्रदान में ये पाँच लक्षण रहते हैं। शान्तभक्तिरस में पूति, वीरभक्तिरस में विस्तार, करुणभक्तिरस में विक्षेप, तथा रौद्रभक्तिरस में विक्षोभ रहता है, इत्यादि। भक्ति की करुण दशा अनुभवरहित भक्तों को दुःखात्मक लग सकती है; परन्तु दक्ष भक्त तो करुण अवस्था में भी अनुभव होने वाले भावों को अत्यन्त आनन्दमय ही मानते हैं। उदाहरण के लिये, रामायण करुणरस से परिपूर्ण है। इसलिये कभी-कभी उसे दुःखात्मक माना जाता है; परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। रामायण में वर्णन है कि किस प्रकार राज्याभिषेक के अवसर पर भगवान् श्रीराम को उनके पिता ने वन में निर्वासित कर दिया था। उनके प्रस्थान के अनन्तर पिता महाराज दशरथ का देहान्त हो गया ! वन में उनकी अर्धांगिनी सीता देवी का रावण ने अपहरण किया और फिर एक महान् युद्ध छिड़ा। जब अन्त में सीता देवी रावण के चंगुल से छूटीं तो रावण और उसके सारे परिवार का नाश हो चुका था। जब सीता देवी घर लौट रहीं थीं तब उन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ी और कुछ ही दिनों बाद उन्हें फिर वनवास मिला। रामायण का यह सब कथानक बड़ा ही करुण है और इसलिये कभी कभी पाठक को दुःखात्मक

२४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु प्रतीत होता है । परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । अन्यथा भगवान् राम के महाभक्त हनुमान् जी रामायण में वर्णित भगवान् राम के चरित्र का नित्य- पाठ क्यों करते । वास्तविकता यह है कि उपरोक्त भक्ति के १२ रसों में से किसी भी रस में सब कुछ दिव्य आनन्ददायी है । श्रीलरूप गोस्वामी इस सन्दर्भ में उन लोगों के लिये शोक करते हैं जो मिथ्या वैराग्य की अग्नि में तप रहे हैं । मिथ्या वैराग्य, शुष्क ज्ञान और कुतर्कों की अग्नि में तपते हुए वे भक्तियोग की उपेक्षा कर देते हैं। जो वेदों के कर्मकाण्ड और निर्विशेष ब्रह्म में आसक्त हैं वे भक्तियोग के दिव्य आनन्द का आस्वादन नहीं कर सकते । अतएव श्रील गोस्वामी का परामर्श है कि जिन्हें यह महामृत प्राप्त है वे भक्ति के रसिक बड़ी सावधानी से शुष्क ज्ञानियों, स्वर्ग के अभिलाषी कर्मियों और निर्विशेष मोक्षकामियों से अपनी भक्ति की रक्षा करें । भक्तों को अपने भगवत्प्रेम रूप महारत्न को चोरों से बचाना चाहिये । भाव यह है कि शुद्धभक्त को उन्हें भक्तियोग और उसके विभिन्न तात्त्विक पक्षों का विवरण नहीं सुनाना चाहिये, जो केवल शुष्क ज्ञानी हैं अथवा मिथ्या वैराग्य का अभिमान रखते हैं । जो भक्त नहीं हैं उनके लिये भक्तिरस सर्वथा दुरूह है । अभक्त इस भक्तिरस के महत्त्व को, इसकी महिमा-गरिमा को कभी नहीं समझ सकता । उन्हें भक्तियोग का लाभ कभी नहीं मिल सकता । जिन्होंने भगवान् के चरणों में अपना जीवन-सर्वस्व चढ़ा दिया है वे भक्तजन ही यथार्थ भक्ति- रसामृत का आस्वादन कर सकते हैं । भक्त जब भावना के पथ का उल्लंघन करके शुद्ध सत्त्व की सर्वोच्च भावभूमि पर आरूढ़ हो जाता है तब हृदय का सब प्रकार के दोषों से परिष्कार हो जाता है । जीवन की उस शुद्ध अवस्था में इस अमृत का आस्वादन हो सकता है । आस्वादन की इसी योग्यता का नाम रस है । इति भक्तिरसामृतसिन्धौ भक्तिरससामान्य निरूपणनामा दक्षिणो विभागः ॥ इति भक्तिवेदान्त भाष्ये दक्षिणो विभागः ॥२॥

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अथ पश्चिमो विभागः मुख्यभक्तिरस

अध्याय ३५ शान्तरस श्रील रूपगोस्वामी सनातन-स्वरूप श्रीभगवान् को सादर प्रणाम करते हैं, जो नित्य मनोहर रूपधारी हैं और जिनके लिये शुद्धभक्त निरन्तर प्रेममयी सेवा में संलग्न रहते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के इस पश्चिम विभाग में पाँच प्रकार के मुख्य भक्तिरस अर्थात् शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य ओर माधुर्य का वर्णन है। इन पाँचों तत्त्वों का यहाँ विशद रूप से प्रतिपादन किया जायगा। इसलिये इन्हें इस भक्तिरस रूपसागर की पश्चिम दिशा में उठने वाली पाँच लहरियों की उपमा दी गई है। जब कोई निरन्तर शुद्धसत्त्व में स्थिर रह सकता है तो उसकी अवस्था भक्तिरस के शान्तरस में समझी जाती है। बहुत से महर्षियों को यह शान्त अवस्था तप-त्याग और इन्द्रियसंयम के लिये ध्यान करने से उपलब्ध हो चुकी है। ऐसे ऋषि सामान्यतः ध्यानयोगी कहलाते हैं और प्रायः उनकी प्रवृत्ति निर्विशेष ब्रह्म के दिव्यानन्द को भोगने की ओर रहती है। श्रीभगवान् के निज संग से प्राप्त होने वाले दिव्य आनन्द रस का उन्हें प्रायः कोई आभास नहीं होता। वास्तव में परम पुरुष के संग में प्राप्त होने वाला दिव्य आह्लाद निर्विशेष ब्रह्मानुभूति से प्राप्त आनन्द से कहीं बढ़कर है क्योंकि इसमें श्रीभगवान् के सनातन रूप का सीधा साक्षात्कार होता है। निर्विशेषवादी भगवान् की लीलाकथा नहीं सुनते; इसीलिये उन्हें साक्षात् श्रीभगवान् के संग से होने वाला दिव्य सुख नहीं मिलता। इसलिये वे उस भगवद्गीता की वार्ता से भी कोई दिव्यसुख नहीं पाते, जिसे स्वयं श्रीभगवान् ने अर्जुन को सुनाया। उनकी निर्विशेष मनोवृत्ति का प्रधान सिद्धान्त उन्हें वह दिव्य सुख नहीं लेने देता जिसका आस्वादन परम पुरुष के संग में भक्तजन करते हैं। इसीलिये भगवद्गीता पर निर्विशेष भाष्य उत्पातकारी सिद्ध होता है, क्योंकि गीता के दिव्य आनन्द को जाने बिना निर्विशेषवादी उसे अपनी

२४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सुविधा के अनुसार अर्थ देना चाहते हैं । परन्तु यदि कोई निर्विशेषवादी शुद्धभक्त के संग में आ जाये तो वह अपनी निर्विशेष ब्रह्मानुभूति से ऊपर पहुँच सकता है। अतएव बड़े-बड़े ऋषियों को भी परमोच्च दिव्य आनन्द के लिए भगवान् के विग्रह की आराधना का परामर्श दिया गया है। अर्चा विग्रह की आराधना किये बिना 'भगवद्गीता' और 'श्रीमद्- भागवत' जैसे शास्त्रों को नहीं समझा जा सकता। जो दिव्य शान्त अवस्था में हैं, उन महर्षियों को भगवान् के चतुर्भुज नारायण रूप का प्रारम्भ में आश्रय लेना चाहिये । ध्यानयोगियों के लिये विधान है कि वे भगवान् विष्णु के रूप का ध्यान करें, जैसा कपिलमुनि ने सांख्ययोग में बताया है। दुर्भाग्यवश बहुत से ध्यानयोगी किसी शून्य पर ध्यान करने का प्रयास करते हैं और जैसा भगवद्गीता में कहा है, इसके परिणाम में उन्हें केवल कष्ट ही कष्ट होता है। कोई सफलता नहीं मिलती। जब किन्हीं तपोनिष्ठ संत पुरुषों ने भगवान् विष्णु के चतुर्भुज रूप को देखा तो वे कहने लगे, “यह भगवान् का चतुर्भुज रूप है। ये घनश्याम आकृति प्रभु सारे रसों के निधान, आनन्दराशि और हमारे जीवन के केन्द्र हैं। वास्तव में जब हम विष्णु के शाश्वत् रूप को देखते हैं तो परमहंसों के साथ हम भी अविलम्ब भगवान् की माधुरी पर मोहित हो जाते हैं।” संत पुरुषों द्वारा भगवान् विष्णु का यह आस्वादन शान्तरस में होता है। प्रारम्भिक साधक कठोर तप-त्याग के द्वारा प्राकृत बन्धन से मोक्ष पाने का प्रयास करते हैं और ऐसा करते-करते निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार तक पहुँच जाते हैं। इस ब्रह्मभूत मुक्तावस्था में जैसा भगवद्गीता में बताया गया है, जीव प्रसन्न, शोक और आकांक्षा से मुक्त तथा प्राणीमात्र में समभाव वाला हो जाता है। जब भक्त भक्ति के शान्तरस में स्थिर होता है, तो वह भगवान् के विष्णु रूप का आस्वादन करता है। वास्तव में सम्पूर्ण वैदिक संस्कृति का लक्ष्य भगवान् विष्णु को जानना है। ऋग्वेद में एक मन्त्र कहता है कि, सभी संत पुरुष भगवान् विष्णु के चरणकमलों के ध्यान में ही नित्य संलग्न रहा करते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार मूर्ख नहीं जानते कि विष्णु जीवन के परम लक्ष्य हैं। सम्पूर्ण प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों का निष्कर्ष है कि जब कोई विष्णु को समझ जाता है तभी उसके भक्तियोग का प्रारम्भ होता है। यदि योग्य गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति का उत्तरोत्तर सेवन किया जाये तो भक्ति के अन्य पक्ष भी शनैः शनैः स्फुरित हो जायेंगे। शान्त

शान्तरस [ २४७ रस की इस अवस्था में दैत्यों को भी गति देने वाले भगवान् विष्णु को देखा जा सकता है। उनका साक्षात्कार किया जा सकता है। ऐसे भक्त भगवान् को सच्चिदानन्दघन, आत्मारामों में शिरोमणि, परमात्मा परब्रह्म, आत्मसंयमी, शुद्ध भक्तों पर कृपा करने वाले और किसी भी लौकिक परिस्थिति से परे अनुभव करते हैं। सन्त पुरुषों द्वारा संभ्रम और सम्मान के साथ भगवान् विष्णु के इन गुणों का ग्रहण शान्तरस का लक्षण माना जाता है। शान्तरस की इस अवस्था की प्राप्ति निर्विशेषवादियों को तभी हो सकती है जब वे शुद्ध भक्तों के संग में हों; अन्यथा ऐसा नहीं हो सकता। ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद जब कोई जीवन्मुक्त पुरुष भगवान् विष्णु के शुद्धभक्त के संग में आता है और आज्ञानुवर्ती विनम्रभाव से भगवान् श्रीकृष्ण की शिक्षा को अर्थ का अनर्थ किये बिना स्वीकार कर लेता है तब वह भक्तियोग के शान्तरस में सिद्ध हो जाता है। शान्तरस में सिद्ध संत पुरुषों के सर्वोत्तम उदाहरण सनक, सनातन, सनन्दन और सनत्कुमार हैं। ये चारों कुमार, जिन्हें चतुस्सम कहा जाता है, ब्रह्मा के पुत्र हैं। जन्म के बाद इन्हें पिता से आज्ञा मिली थी कि वे गृहस्थ बनकर मानव समाज का विस्तार करें। परन्तु उन्होंने इस आज्ञा को नहीं माना। उन्होंने कहा वे निर्णय कर चुके हैं कि गृहस्थ जीवन के प्रपंच में नहीं फसेंगे; इसके स्थान पर आत्मसिद्धि के लिये संत ब्रह्मचारियों के रूप में ही रहेंगे। इस प्रकार ये संत पुरुष करोड़ों वर्षों से हैं; परन्तु अब भी इनका स्वरूप चार- पांच वर्ष के बालकों जैसा है। इनका श्वेत वर्ण है, शरीर दिव्य ज्योति से दीप्त है और निरन्तर दिगम्बरधारी हैं। ये चारों निरन्तर एक साथ रहते हैं। चारों कुमारों की एक प्रार्थना में इस प्रकार घोषणा है, “हे मुकुन्द !, हे मुक्तिदाता कृष्ण ! जब तक नवतमाल की नीलद्युति वाले आपके सच्चिदानन्दघन रूप का दर्शन नहीं हो जाता तभी तक निर्विशेष ब्रह्म संतों को सुखदायी लगता है।” संत पुरुष की योग्यता का वर्णन 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में इस प्रकार है-संत पुरुष वह है जो यह पूर्ण रूप से जानता हो कि केवल भक्तियोग का आचरण करने से उसकी मुक्ति निश्चित हो जायगी। वह निरन्तर भक्ति के विधिविधान में स्थित रहता है और साथ ही भव-बन्धन से छूट जाना चाहता है। संत पुरुष इस प्रकार सोचते हैं, “वह दिन कब होगा जब मैं अकेले