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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

२३२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु लक्षण अभिव्यक्त होंगे। भाव के लक्षण हृदय की स्थिति के अनुसार ही होते हैं। सामान्यतया लोग मन की नाना वृत्तियों को ही नहीं समझ सकते; परन्तु जब हृदय अत्यन्त मृदु एवं नम्र हो जाता है तो ये लक्षण बड़ी सुगमता से दृश्मान हो जाते हैं और इन्हें स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। गरीष्ठ हृदय स्वर्ण के समान है। गम्भीर हृदय समुद्र के समान है। महीष्ठ हृदय नगर के समान है। मृदु एवं नम्र हृदय रूई के समान है। हृदय में भाव की विद्युत् तरंग उठने पर स्वर्ण जैसे अथवा गम्भीर हृदय में क्षोभ नहीं होता; परन्तु कोमल और मृदु हृदय एकदम क्षुब्ध हो उठता है। इसे एक और उदाहरण से समझा जा सकता है। गम्भीर और उदार हृदय जहाँ एक महानगर के समान है, वहीं कोमल हृदय क्षुद्र कुटिया जैसा है। महानगर में बड़े-बड़े दीप, महाबलशाली हाथी आदि रहते हैं। परन्तु उन पर कोई विशेष ध्यान नहीं देता। यही दीप अथवा हाथी जब किसी क्षुद्र कुटिया के पास हों तो तुरन्त दिखलाई दे जाते हैं। कर्कश चित्त तीन प्रकार का कहा गया है—वज्र के समान, स्वर्ण के समान और लाख के समान। वज्र बड़ा बलशाली होता है, कभी कोमल नहीं पड़ता। उसी प्रकार जो उग्र तप-त्याग में संलग्न हैं, वे सुगमता से द्रवित नहीं हो सकते। उग्र ताप से स्वर्ण पिघल जाता है; इसी प्रकार स्वर्ण के समान कर्कशचित्त अत्यन्त तीव्र भाव रूप अग्नि से पिघल जाता है। लाख के समान हृदय तो थोड़े ही ताप से बिल्कुल सरलता से पिघल जाता है। मृदु अथवा कोमल चित्त मोम, मक्खन तथा अमृत के समान तीन प्रकार का माना जाता है। इन तीनों प्रकार के कोमल चित्त में भाव को सूर्य की उपमा दी जा सकती है। मोम और नवनीत को पिघलाने के लिये थोड़ा सा सूर्यताप भी पर्याप्त होता है। इसी प्रकार कोमलचित्त पुरुष बड़ी सरलता से द्रवित हो जाते हैं। परन्तु अमृत तो स्वभावतः द्रवीभूत अवस्था में रहता है। इसलिये जिन्हें श्रीकृष्ण का शुद्ध प्रेमभाव प्राप्त है, वे स्वभावतः अमृत के समान सदा द्रवित रहते हैं। श्रीकृष्ण के शुद्धभक्त में सदा अमृत के समान गुण रहते हैं और कभी-कभी मक्खन और मोम के गुण भी पाये जाते हैं। सारांश में, उपरोक्त किसी भी भाववृत्ति वाले हृदय को विशिष्ट परिस्थितियों में द्रवित किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार जैसे रसायनों के विशेष सम्मिश्रण से कठोर हीरा भी पिघल जाता है। 'दानकेलिकौमुदी' में उल्लेख है, "जब भक्त के हृदय में प्रेम का उदय होता है तो वह अपने