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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 380 में से

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पृष्ठ 258

अन्य व्यभिचारिभाव [ २३१

राजसेवा से हुआ है। मैंने बलि काल के विषय में नहीं सोचा, जो सबसे प्रबल है और सबको रचता और नष्ट करता है। मैं किसके लिए यह सब धन और वैभव छोडूंगा ? मैं जीर्ण-क्षीण होता चला जा रहा हूँ। अब क्या करूंगा ? तो फिर घर में ही रहकर भगवान् का भजन करूँ। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मन को तो वृन्दावन हठात् अपनी ओर खींच रहा है।" इस उदाहरण में निर्वेद, गर्व, शंका, धृति, विषाद, मति और उत्सुकता—इन सात भावों की शबलता है। संस्कृत में उक्ति है कि 'नैराश्यं परं सुखम्,' अर्थात् जब भावुकता अथवा अभिलाषा इतनी बढ़ जाये कि निराशामय कष्टों के बिना उसकी शान्ति न हो सके तो उनका असफल रह जाने में ही सुख है। एक बार वृन्दावन में श्रीकृष्ण को खोजते-खोजते गोप बालक खिन्न वदन हो गये थे। तभी उन्हें पहाड़ के ऊपर श्रीकृष्ण का मधुर वंशीरव सुनने को मिला। इससे वे आनन्द में मग्न होकर नाचने लगे। यह अत्यारूढ भाव के विलय, अर्थात् शान्ति का उदाहरण है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि यद्यपि उनकी वाणी में शब्द, अर्थ और रसों का कोई चमत्कार नहीं हैं; फिर भी उन्होंने नाना प्रकार के प्रेम में होने वाले भावों का उदाहरण देने का प्रयास किया है। वे आगे कहते हैं कि ३३ व्यभिचारी भाव और ८ अन्य भाव, ये कुल ४१ 'मुख्यभाव' नाम से कहे जाते हैं। इन भावों से शरीर और इन्द्रियों, दोनों में विकार होते हैं। इन सबको हृदय में उठने वाले नाना प्रकार के भाव माना जा सकता है। कोई भाव स्वाभाविक होता है और कोई भाव आगन्तुक होता है। स्वाभाविक भाव भक्त के बाहर-भीतर निरन्तर बने रहते हैं। जैसे वस्त्र को देखकर, वह किस रंग में रंगा गया है, यह जाना जा सकता है; उसी प्रकार इन भावों के लक्षणों के ज्ञान से यथार्थ स्थिति का बोध हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णरति एक ही है; परन्तु भक्त नाना प्रकार के होते हैं। इसलिये इस प्रकार की रति भी नाना रूपों में अभिव्यक्त होती है। जैसे लाल रंग में रंगा वस्त्र लाल प्रतीत होता है; उसी प्रकार किसी भी आगन्तुक भाव को उसके विशिष्ट लक्षणों से जाना जा सकता है। वास्तव में भक्तों के सभी भिन्न-भिन्न रस और भाव चित्त में विशिष्ट-विशिष्ट प्रकार की वृत्तियों को जन्म देते हैं और तीन भेदों के अनुसार प्रेम के लक्षण नाना रूपों और मात्राओं में प्रकट होते हैं। यदि चित्त गरीष्ठ है, गम्भीर है और महीष्ठ है तो प्रेम के एक प्रकार के लक्षण प्रकट होंगे और यदि हृदय कर्कश है, क्रूर है तो भिन्न