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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

भक्तिरसामृत [ २४१ वह दिव्य प्रेममयी सेवा से परिपूर्ण हो जाता है तो परिवर्षण के रूप में अपनी कृपा को बरसाता है और क्रमशः आह्लादिनी शक्ति कृष्णरूप सागर को लौट जाती है। कृष्णभक्तिरस : मुख्य और गौण भक्तियोग से मिलने वाले दिव्य आनन्द रस के दो भेद हैं—मुख्य भक्तिरस और गौणभक्तिरस। मुख्यभक्तिरस पाँच प्रकार का है और गौणभक्तिरस के सात दिव्य प्रकार हैं। मुख्यभक्तिरस के भेद हैं—शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। गौणभक्तिरस के भेद हैं—हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स। इस प्रकार मुख्य और गौण दोनों को मिलाकर भक्तिरस कुल बारह प्रकार का होता है। इन सबका अलग-अलग वर्ण माना गया है। ये क्रमशः इस प्रकार हैं—श्वेत, चित- कबरा, अरुण, शोण, श्यामवर्ण, कपोत, पीत, गौर, धूम्र, रक्त, कृष्ण तथा नील। बारह दिव्य रसों के अधिष्ठाता, बारह अलग-अलग अवतार हैं— कपिल, माधव, उपेन्द्र, नृसिंह, नन्दनन्दन, बलराम, कूर्म, कल्की, राघव, भार्गव, वराह, तथा मत्स्य। पूति, विकास, विस्तार, विक्षेप, और विक्षोभ—प्रेम के आदान- प्रदान में ये पाँच लक्षण रहते हैं। शान्तभक्तिरस में पूति, वीरभक्तिरस में विस्तार, करुणभक्तिरस में विक्षेप, तथा रौद्रभक्तिरस में विक्षोभ रहता है, इत्यादि। भक्ति की करुण दशा अनुभवरहित भक्तों को दुःखात्मक लग सकती है; परन्तु दक्ष भक्त तो करुण अवस्था में भी अनुभव होने वाले भावों को अत्यन्त आनन्दमय ही मानते हैं। उदाहरण के लिये, रामायण करुणरस से परिपूर्ण है। इसलिये कभी-कभी उसे दुःखात्मक माना जाता है; परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। रामायण में वर्णन है कि किस प्रकार राज्याभिषेक के अवसर पर भगवान् श्रीराम को उनके पिता ने वन में निर्वासित कर दिया था। उनके प्रस्थान के अनन्तर पिता महाराज दशरथ का देहान्त हो गया ! वन में उनकी अर्धांगिनी सीता देवी का रावण ने अपहरण किया और फिर एक महान् युद्ध छिड़ा। जब अन्त में सीता देवी रावण के चंगुल से छूटीं तो रावण और उसके सारे परिवार का नाश हो चुका था। जब सीता देवी घर लौट रहीं थीं तब उन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ी और कुछ ही दिनों बाद उन्हें फिर वनवास मिला। रामायण का यह सब कथानक बड़ा ही करुण है और इसलिये कभी कभी पाठक को दुःखात्मक