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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

अध्याय ३४ भक्तिरसामृत अलग-अलग भक्तों के हृदय में उदित होने वाले भिन्न-भिन्न विशिष्ट भावों को विभाव कहते हैं । इनके फलस्वरूप प्रकट कटाक्ष, भय, विस्मय, हास आदि पूर्ववर्णित भाव अनुभाव कहलाते हैं । अनुभाव और विभाव को जन्म देने वाले नाना कारण संचारिभाव हैं । जब भी श्रीकृष्णलीला विषयक काव्य अथवा नाटक का आयोजन होता है तो श्रोताओं अथवा दर्शकों में नाना प्रकार के दिव्य सेवाभाव का उदय होता है और वे भिन्न-भिन्न विभाव, अनुभाव और संचारिभावों का आस्वादन करते हैं । जो देहात्मबुद्धि के स्तर पर है वह केवल नाना शास्त्रवचनों के आधार पर भिन्न-भिन्न भाव और अनुभाव का ऐसा वर्णन नहीं करे । इनकी अभिव्यक्ति भगवान् की दिव्य आह्लादिनी शक्ति का कार्य है । बस यह समझना चाहिये कि दिव्य स्तर पर प्रेम का नाना प्रकार से आदान-प्रदान होता है । प्रेम के ऐसे आदान-प्रदान को प्राकृत अथवा लौकिक समझने की भूल कभी न करें। महाभारत उद्योगपर्व में चेतावनी है कि अचिन्त्य वस्तु को तर्क का विषय नहीं बनाना चाहिये । वास्तव में अपनी वर्तमान दशा में वैकुण्ठ जगत् की क्रियाएँ हमारे लिये अचिन्त्य हैं । रूपगोस्वामी जैसे महापुरुषों ने वैकुण्ठजगत् की दिव्य क्रियाओं का संकेत करने का प्रयास अवश्य किया है; परन्तु पूर्ण रूप से ये क्रियाएँ वर्तमान में हमारे चिन्तन से परे ही रहेंगी । श्रीकृष्ण से होने वाले दिव्य सेवाभाव- विनिमय को तभी समझा जा सकता है जब कोई वास्तव में उनकी आह्ला- दिनी शक्ति के संस्पर्श में स्थित हो जाये । इस सन्दर्भ में रूपगोस्वामी आकाश के मेघों का उदाहरण देते हैं— आकाश में मेघ सागर से उठते हैं और बरस जाने पर उनका जल दुबारा नीचे गिरकर सागर को लौट जाता है । इस प्रकार सागर के समान ही श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है । शुद्धभक्त रसधारी मेघ है और जब