भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाव के गौण लक्षण [ २३६
दैत्य द्वारा श्रीकृष्ण के हरण का वर्णन है। श्रीकृष्ण को आकाश में उड़ा जाता देखकर सारी गोपियाँ उच्च-उच्च कंठ से रोने लगीं। नन्द- नन्दन को न देख पाने पर वे माता यशोदा को उपालम्भ देने लगीं। यह शोकरति का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को कालिय नाग से लड़ता देखकर यशोदा मैय्या पुकार उठीं, "मेरा प्राणप्रिय कृष्ण कालिय सर्प की फणों में जकड़ा हुआ है; फिर भी हृदय टुकड़े-टुकड़े नहीं होता। इस शरीर की ऐसी कठोरता को धिक्कार है।" यह भी शोकरति का दृष्टान्त है। क्रोधरति जब अभिमन्यु की माता जटिला ने श्रीकृष्ण को एक रत्नहार पहने देखा तो वह समझ गई कि यह अवश्य उन्हें राधारानी ने भेंट किया है। वह क्रोध से भर गई और टेढ़ी भौंहों से उन्हें घूरने लगीं। यह क्रोधरति का उदाहरण है। जुगुप्सारति यामुनाचार्य जी कहते हैं, "जब से मैं श्रीकृष्ण के साथ नित्य नव- नव रसों का आस्वादन आदान-प्रदान करने लगा हूँ, तबसे अपने पिछले स्त्रीसंग की याद आते ही मेरे होंठ घृणा से सिकुड़ जाते हैं; यहाँ तक कि मैं उस विचार पर ही थूकने लगता हूँ।" यह जुगुप्सारति है। भयरति एक पुराना भक्त कहने लगा, "हे नाथ ! जब हम आपसे दूर होते हैं तो फिर आपके दोबारा दर्शनों के लिये बड़ी उत्कंठा होती है। हमारा जीवन दुःखों से भर जाता है। परन्तु जब आप फिर मिलते हैं तो विरह का भय उपस्थित हो जाता है। अतएव चाहे आप मिलें अथवा न मिलें हमें सदा नाना प्रकार का भय सताया करता है।" यह कृष्णरति में विरोधी भावों के संकुलन का उदाहरण है। ऐसी रति बड़ी ही आस्वाद्य होती है और कुशल रसाज्ञों ने इसे दही, शक्कर और कालीमिर्च के मिश्रण की उपमा दी है। इन सबका सम्मिलित स्वाद बड़ा ही रसमय होता है।