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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 380 में से

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पृष्ठ 265

अध्याय ३३ भाव के गौण लक्षण हास दो गोपियों के भांडों में से दही की चोरी करने के बाद पकड़े जाने पर श्रीकृष्ण ने अपनी गोपी सखी से कहा, "हे सखि ! हे सुमुखि ! मैं शपथ खाता हूँ कि मैंने तुम्हारे भाँड की दही को देखा तक नहीं है; परन्तु फिर भी तुम्हारी सखी राधारानी निर्लज्जता पूर्वक मेरे मुख की गन्ध को सूंघ रही है। मानो मैंने ही इसकी दही खा ली हो। इसे इस प्रकार के असाधु व्यवहार से रोको ।" श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहने पर राधारानी की सखियाँ अपनी हँसी को रोक नहीं सकीं। यह हासरति का उदाहरण है । विस्मय ब्रह्मा ने देखा कि सारी गायें और सारे गोप-बालक पीताम्बर और नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं। सभी बालक चतुर्भुजधारी थे और सैकड़ों ब्रह्मा उनकी आराधना कर रहे थे ! साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण के साथ होने के कारण उन गोप-बालकों का आनन्द खूब खिल रहा था। उस समय अपने विस्मय में ब्रह्मा कह उठे, "यह सब मैं क्या देख रहा हूँ ?" यह विस्मयरति का उदाहरण है। उत्साहरति शृंग की बनी वंशी की ध्वनि से जिसका आकाश गुंजायमान हो रहा था इस प्रकार की यमुना तट की भूमि पर श्रीकृष्ण के साथ लड़ने के लिये उद्यत गरजते हुए श्रीदामा ने बलपूर्वक अपनी कमर कस ली, अर्थात् लड़ने को कटिबद्ध हो गया । शोकरति श्रीमद्भागवत (१०.७.२५) में आंधी के रूप में आये तृणावर्त