भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थायिभाव के लक्षण [ २३७ कानन में पुष्प चयन के लिये चले जाने पर मेरे वे मित्र गोपबालक क्षण भर के लिये मेरे विरह को न सह सके। इसलिये जब उन्होंने मुझे ढूँढ निकाला तो पहले मैं, पहले मैं, यह कहकर उन्होंने स्पर्धा पूर्वक मुझे स्पर्श करते हुये आलिंगन किया।" एक मित्र ने श्रीकृष्ण को फटकारते हुए कहा, "हे दामोदर ! यद्यपि श्रीदामा ने तुम्हें हराकर तुम्हारे अभिमान को चूर-चूर कर दिया है परन्तु फिर भी बल के मिथ्या दम्भ से अपनी इस लज्जा जनक पराजय को छिपाने का प्रयास कर रहे हो।" वात्सल्य जब माता यशोदा ने सुना कि श्रीकृष्ण की गायों को कंस के बलशाली सेवक बलात् हरकर लिये जा रहे हैं और बेचारे गोपबालक अपनी गायों की रक्षा का प्रयास कर रहे हैं तो वे सोचने लगीं, "मैं इन निरीह बालकों को कंस के सेवकों के आक्रमण से कैसे बचाऊँ?" यह भक्त के वात्सल्य भाव का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को वन से गोचारण करके लौटता देखकर प्रेम से द्रवित हुई माता यशोदा तुरन्त उनके कपोलों को अपनी अंगुलियों से छूते हुए प्यार करने लगीं। माधुर्य श्रीकृष्ण और उनके माता-पिता में पाई जाने वाली वात्सल्यरति से भी ऊपर मधुरारति है। श्रीकृष्ण और गोपांगनाएँ कटाक्ष, भ्रू-विलास, प्रियवाणी, और स्मितादि के द्वारा इसे अभिव्यक्त करते हैं। 'गोविन्दविलास' में एक वाक्य है—"श्रीमती राधारानी बड़ी ही उत्कंठा से श्रीकृष्ण का अन्वेषण कर रही थीं। उनकी यह उत्कंठा प्रायः निराशा में परिवर्तित हो चली थी।" जब मधुरारति की ऐसी गौण अभि- व्यक्ति होती है तो हास, आश्चर्य, उत्साह, विषाद, क्रोध, भय और कभी कभी जुगुप्सा का भाव भी होता है। इन सातों प्रकार के भावों से गौण रति बनती है। मुख्या मधुरारति में हास, आश्चर्य, उत्साह, विषाद, भय तथा क्रोध तो रहते हैं, परन्तु जुगुप्सा नहीं होती। इन सभी लक्षणों को आनन्दरस का बड़ा निधान माना जाता है। जब ये सात प्रकार के प्रेम बन्ध अभिव्यक्त होते हैं तो वे स्थायित्व को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे मधुरारति का स्वाद बढ़ता है।