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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 380 में से

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पृष्ठ 256

अन्य व्यभिचारभाव [ २२६ भाव के लक्षणों के कभी-कभी उत्पत्ति, सन्धि, शबलता और शान्ति रूप चार वर्ग किए जाते हैं। एक दिन श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानी से कहने लगे, "जब तुमने प्रातः एकान्त में मुझसे मिलने की चेष्टा की तो तुम्हारी सखी मेखला ईर्ष्यावश भूखी ही रही। उसे देखो तो।" श्रीकृष्ण के इस परिहास को सुनकर राधारानी अपनी भौंहों को टेढ़ा घुमाने लगीं। रूप गोस्वामी की प्रार्थना है कि राधारानी के इस भ्रू-नर्तन से सब का कल्याण हो। इस भाव में असूया के उदय का उदाहरण है। एक रात पूतना के मृत शरीर पर बालकृष्ण को खेलता देखकर माँ यशोदा कुछ समय के लिये निश्चलदेह रह गई। यह दो भावों की सन्धि का उदाहरण है। ऐसी सन्धि इष्ट-अनिष्ट—दोनों में से कोई भी हो सकती है। पूतना का मरना इष्ट था; परन्तु आधी रात में अकेले बालकृष्ण का उसके वक्ष पर खेलना अनिष्ट की आशंका को जन्म दे रहा था। इस प्रकार यशोदा इष्ट और अनिष्ट के बीच पकड़ी गयीं। जब कृष्ण ने चलना सिखा ही था कि वे बार-बार घर के बाहर जाते और फिर अन्दर आते। इस पर यशोदा ने आश्चर्य से कहा; यह बालक बहुत ही चंचल है और किसी से भी नहीं डरता। बार-बार वृन्दावन के अड़ौस-पड़ोस में जाता है और फिर वापस घर में लौट आता है। यह बिल्कुल निडर है, परन्तु फिर भी मुझे भय लगता है कि यह कहीं किसी संकट में न पड़ जाये। यह एक ही कारण से उत्पन्न दो परस्पर भिन्न व्यभिचारिभावों की सन्धि का उदाहरण है। बालक अत्यन्त निडर था; परन्तु फिर भी यशोदा को संकट का भय लग रहा था। इसमें हर्ष और शंका दो अलग-अलग हेतु हैं। भाव यह है कि बालक को बार-बार अन्दर बाहर आता देखकर यशोदा को हर्ष भी हो रहा था और भय की शंका भी हृदय में उठ रही थी। जब देवकी ने अपने पुत्र कृष्ण के प्रसन्नवदन को कंस की रंगशाला में पहलवानों के सम्मुख देखा, तो उसके नेत्रों से ठंडे और गरम दोनों प्रकार के आँसू एक साथ विगलित होने लगे। यह दो अलग कारणों से उत्पन्न हर्ष और शोक की सन्धि है। एक समय जब श्रीमती राधारानी वृन्दावन में यमुना के तीर पर खड़ी थीं तो श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने परिरंभम में पकड़ लिया। श्रीकृष्ण ने ऐसा बलपूर्वक किया था। यद्यपि राधारानी ने इसके लिये बाहर अप्रसन्नता व्यक्त की; परन्तु अपने अन्तर में वे मुस्करा रही थीं और उन्हें अतिशय