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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

२४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सुविधा के अनुसार अर्थ देना चाहते हैं । परन्तु यदि कोई निर्विशेषवादी शुद्धभक्त के संग में आ जाये तो वह अपनी निर्विशेष ब्रह्मानुभूति से ऊपर पहुँच सकता है। अतएव बड़े-बड़े ऋषियों को भी परमोच्च दिव्य आनन्द के लिए भगवान् के विग्रह की आराधना का परामर्श दिया गया है। अर्चा विग्रह की आराधना किये बिना 'भगवद्गीता' और 'श्रीमद्- भागवत' जैसे शास्त्रों को नहीं समझा जा सकता। जो दिव्य शान्त अवस्था में हैं, उन महर्षियों को भगवान् के चतुर्भुज नारायण रूप का प्रारम्भ में आश्रय लेना चाहिये । ध्यानयोगियों के लिये विधान है कि वे भगवान् विष्णु के रूप का ध्यान करें, जैसा कपिलमुनि ने सांख्ययोग में बताया है। दुर्भाग्यवश बहुत से ध्यानयोगी किसी शून्य पर ध्यान करने का प्रयास करते हैं और जैसा भगवद्गीता में कहा है, इसके परिणाम में उन्हें केवल कष्ट ही कष्ट होता है। कोई सफलता नहीं मिलती। जब किन्हीं तपोनिष्ठ संत पुरुषों ने भगवान् विष्णु के चतुर्भुज रूप को देखा तो वे कहने लगे, “यह भगवान् का चतुर्भुज रूप है। ये घनश्याम आकृति प्रभु सारे रसों के निधान, आनन्दराशि और हमारे जीवन के केन्द्र हैं। वास्तव में जब हम विष्णु के शाश्वत् रूप को देखते हैं तो परमहंसों के साथ हम भी अविलम्ब भगवान् की माधुरी पर मोहित हो जाते हैं।” संत पुरुषों द्वारा भगवान् विष्णु का यह आस्वादन शान्तरस में होता है। प्रारम्भिक साधक कठोर तप-त्याग के द्वारा प्राकृत बन्धन से मोक्ष पाने का प्रयास करते हैं और ऐसा करते-करते निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार तक पहुँच जाते हैं। इस ब्रह्मभूत मुक्तावस्था में जैसा भगवद्गीता में बताया गया है, जीव प्रसन्न, शोक और आकांक्षा से मुक्त तथा प्राणीमात्र में समभाव वाला हो जाता है। जब भक्त भक्ति के शान्तरस में स्थिर होता है, तो वह भगवान् के विष्णु रूप का आस्वादन करता है। वास्तव में सम्पूर्ण वैदिक संस्कृति का लक्ष्य भगवान् विष्णु को जानना है। ऋग्वेद में एक मन्त्र कहता है कि, सभी संत पुरुष भगवान् विष्णु के चरणकमलों के ध्यान में ही नित्य संलग्न रहा करते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार मूर्ख नहीं जानते कि विष्णु जीवन के परम लक्ष्य हैं। सम्पूर्ण प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों का निष्कर्ष है कि जब कोई विष्णु को समझ जाता है तभी उसके भक्तियोग का प्रारम्भ होता है। यदि योग्य गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति का उत्तरोत्तर सेवन किया जाये तो भक्ति के अन्य पक्ष भी शनैः शनैः स्फुरित हो जायेंगे। शान्त