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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

अध्याय ३५ शान्तरस श्रील रूपगोस्वामी सनातन-स्वरूप श्रीभगवान् को सादर प्रणाम करते हैं, जो नित्य मनोहर रूपधारी हैं और जिनके लिये शुद्धभक्त निरन्तर प्रेममयी सेवा में संलग्न रहते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के इस पश्चिम विभाग में पाँच प्रकार के मुख्य भक्तिरस अर्थात् शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य ओर माधुर्य का वर्णन है। इन पाँचों तत्त्वों का यहाँ विशद रूप से प्रतिपादन किया जायगा। इसलिये इन्हें इस भक्तिरस रूपसागर की पश्चिम दिशा में उठने वाली पाँच लहरियों की उपमा दी गई है। जब कोई निरन्तर शुद्धसत्त्व में स्थिर रह सकता है तो उसकी अवस्था भक्तिरस के शान्तरस में समझी जाती है। बहुत से महर्षियों को यह शान्त अवस्था तप-त्याग और इन्द्रियसंयम के लिये ध्यान करने से उपलब्ध हो चुकी है। ऐसे ऋषि सामान्यतः ध्यानयोगी कहलाते हैं और प्रायः उनकी प्रवृत्ति निर्विशेष ब्रह्म के दिव्यानन्द को भोगने की ओर रहती है। श्रीभगवान् के निज संग से प्राप्त होने वाले दिव्य आनन्द रस का उन्हें प्रायः कोई आभास नहीं होता। वास्तव में परम पुरुष के संग में प्राप्त होने वाला दिव्य आह्लाद निर्विशेष ब्रह्मानुभूति से प्राप्त आनन्द से कहीं बढ़कर है क्योंकि इसमें श्रीभगवान् के सनातन रूप का सीधा साक्षात्कार होता है। निर्विशेषवादी भगवान् की लीलाकथा नहीं सुनते; इसीलिये उन्हें साक्षात् श्रीभगवान् के संग से होने वाला दिव्य सुख नहीं मिलता। इसलिये वे उस भगवद्गीता की वार्ता से भी कोई दिव्यसुख नहीं पाते, जिसे स्वयं श्रीभगवान् ने अर्जुन को सुनाया। उनकी निर्विशेष मनोवृत्ति का प्रधान सिद्धान्त उन्हें वह दिव्य सुख नहीं लेने देता जिसका आस्वादन परम पुरुष के संग में भक्तजन करते हैं। इसीलिये भगवद्गीता पर निर्विशेष भाष्य उत्पातकारी सिद्ध होता है, क्योंकि गीता के दिव्य आनन्द को जाने बिना निर्विशेषवादी उसे अपनी