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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 274

शान्तरस [ २४७ रस की इस अवस्था में दैत्यों को भी गति देने वाले भगवान् विष्णु को देखा जा सकता है। उनका साक्षात्कार किया जा सकता है। ऐसे भक्त भगवान् को सच्चिदानन्दघन, आत्मारामों में शिरोमणि, परमात्मा परब्रह्म, आत्मसंयमी, शुद्ध भक्तों पर कृपा करने वाले और किसी भी लौकिक परिस्थिति से परे अनुभव करते हैं। सन्त पुरुषों द्वारा संभ्रम और सम्मान के साथ भगवान् विष्णु के इन गुणों का ग्रहण शान्तरस का लक्षण माना जाता है। शान्तरस की इस अवस्था की प्राप्ति निर्विशेषवादियों को तभी हो सकती है जब वे शुद्ध भक्तों के संग में हों; अन्यथा ऐसा नहीं हो सकता। ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद जब कोई जीवन्मुक्त पुरुष भगवान् विष्णु के शुद्धभक्त के संग में आता है और आज्ञानुवर्ती विनम्रभाव से भगवान् श्रीकृष्ण की शिक्षा को अर्थ का अनर्थ किये बिना स्वीकार कर लेता है तब वह भक्तियोग के शान्तरस में सिद्ध हो जाता है। शान्तरस में सिद्ध संत पुरुषों के सर्वोत्तम उदाहरण सनक, सनातन, सनन्दन और सनत्कुमार हैं। ये चारों कुमार, जिन्हें चतुस्सम कहा जाता है, ब्रह्मा के पुत्र हैं। जन्म के बाद इन्हें पिता से आज्ञा मिली थी कि वे गृहस्थ बनकर मानव समाज का विस्तार करें। परन्तु उन्होंने इस आज्ञा को नहीं माना। उन्होंने कहा वे निर्णय कर चुके हैं कि गृहस्थ जीवन के प्रपंच में नहीं फसेंगे; इसके स्थान पर आत्मसिद्धि के लिये संत ब्रह्मचारियों के रूप में ही रहेंगे। इस प्रकार ये संत पुरुष करोड़ों वर्षों से हैं; परन्तु अब भी इनका स्वरूप चार- पांच वर्ष के बालकों जैसा है। इनका श्वेत वर्ण है, शरीर दिव्य ज्योति से दीप्त है और निरन्तर दिगम्बरधारी हैं। ये चारों निरन्तर एक साथ रहते हैं। चारों कुमारों की एक प्रार्थना में इस प्रकार घोषणा है, “हे मुकुन्द !, हे मुक्तिदाता कृष्ण ! जब तक नवतमाल की नीलद्युति वाले आपके सच्चिदानन्दघन रूप का दर्शन नहीं हो जाता तभी तक निर्विशेष ब्रह्म संतों को सुखदायी लगता है।” संत पुरुष की योग्यता का वर्णन 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में इस प्रकार है-संत पुरुष वह है जो यह पूर्ण रूप से जानता हो कि केवल भक्तियोग का आचरण करने से उसकी मुक्ति निश्चित हो जायगी। वह निरन्तर भक्ति के विधिविधान में स्थित रहता है और साथ ही भव-बन्धन से छूट जाना चाहता है। संत पुरुष इस प्रकार सोचते हैं, “वह दिन कब होगा जब मैं अकेले