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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

२४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पर्वत की कन्दरा में रह सकूँगा ? वह दिन कब होगा जब मैं केवल कौपीन धारण कर काम चला सकूँगा ? कब ऐसा होगा जब थोड़े से फल-फूल खाने से मेरी तृप्ति हो जाया करेंगी ? ऐसा कब होगा जब ब्रह्मज्योति के स्रोत भगवान् मुकुन्द के चरण युगल अरविन्द का मैं निरन्तर स्मरण करता रहूँगा ? इस प्रकार रहते हुए कब मैं अपने दिन रात को सनातन काल के क्षुद्र क्षण समझ सकूँगा । भगवान् की कीर्ति का गान करने वाले भक्त और स्वरूपप्राप्त पुरुष निरन्तर हृदय में भगवान् के लिये प्रेमभाव को धारण किये रहते हैं। इस प्रकार शान्तभाव रूप चन्द्रमा उन पर अमृत बरसाया करता है और वे सन्त कहलाते हैं। सन्त पुरुषों में वेदों और विशेषतः उपनिषदों को पढ़ने की, निरन्तर एकान्त स्थान में रहने की, सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण के शाश्वत् रूप के चिन्तन, विद्या की प्रधानता, कृष्णरूप के दर्शन, विष्णु रूप के दर्शन, ज्ञानी भक्तों के साथ सम्पर्क करने और अपने समान उच्च पुरुषों के साथ वेदों की वार्ता करने की ओर स्वाभाविक प्रवृति रहती है। अतः ये गुण सन्त पुरुष को शान्तरस के स्तर पर उठाने वाले उद्दीपन हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में उल्लेख है कि जो सब उपनिषद् आदि वैदिक शास्त्रों के अध्ययन के लिए भगवान् ब्रह्मा द्वारा आयोजित पुण्य गोष्ठी में एकत्र हुए थे वे सब यदुवंश शिरोमणि श्रीकृष्ण के प्रेम से भाव-विह्वल हो उठे। वास्तव में उपनिषदों के स्वाध्याय का उद्देश्य भगवान् के तत्त्व को जानना है। संसार का निराकरण तो उपनिषदों का केवल एक आनुषंगिक विषय है। दूसरा विषय है निर्विशेष साक्षात्कार के बाद निर्विशेष ब्रह्म का उल्लंघन करने पर जब कोई भगवान् के संग में आता है तब उपनिषदों के स्वाध्याय का परम प्रयोजन सिद्ध होता है। भगवान् के चरणों में अर्पित तुलसी को सूँघना, उनके शंख की ध्वनि को सुनना, गोवर्धन जैसे पुण्य पर्वत, वृन्दावन जैसे पुण्य वन को देखना; गंगा तट पर जाना; खाना, सोना, मैथुन और भय—इन शारीरिक आवश्यकताओं को जीत लेना; काल के सर्वसंहारत्व को जानना; कृष्ण- भावना परायण भक्तों से निरन्तर संग करना—ये सब संत पुरुषों को शान्तरस में आरूढ़ कर भक्तिरस की उच्च अवस्था में पहुँचा सकते हैं इसलिये इन्हें शान्तरस के विभाव कहा जाता है। श्रीमद्भागवत (३.१५.४३) में सनकादि चार कुमारों का एक वाक्य है। उसके अनुसार जब वे वैकुण्ठ लोक में भगवान् का दर्शन करने के