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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

२४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पर्वत की कन्दरा में रह सकूँगा ? वह दिन कब होगा जब मैं केवल कौपीन धारण कर काम चला सकूँगा ? कब ऐसा होगा जब थोड़े से फल-फूल खाने से मेरी तृप्ति हो जाया करेंगी ? ऐसा कब होगा जब ब्रह्मज्योति के स्रोत भगवान् मुकुन्द के चरण युगल अरविन्द का मैं निरन्तर स्मरण करता रहूँगा ? इस प्रकार रहते हुए कब मैं अपने दिन रात को सनातन काल के क्षुद्र क्षण समझ सकूँगा । भगवान् की कीर्ति का गान करने वाले भक्त और स्वरूपप्राप्त पुरुष निरन्तर हृदय में भगवान् के लिये प्रेमभाव को धारण किये रहते हैं। इस प्रकार शान्तभाव रूप चन्द्रमा उन पर अमृत बरसाया करता है और वे सन्त कहलाते हैं। सन्त पुरुषों में वेदों और विशेषतः उपनिषदों को पढ़ने की, निरन्तर एकान्त स्थान में रहने की, सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण के शाश्वत् रूप के चिन्तन, विद्या की प्रधानता, कृष्णरूप के दर्शन, विष्णु रूप के दर्शन, ज्ञानी भक्तों के साथ सम्पर्क करने और अपने समान उच्च पुरुषों के साथ वेदों की वार्ता करने की ओर स्वाभाविक प्रवृति रहती है। अतः ये गुण सन्त पुरुष को शान्तरस के स्तर पर उठाने वाले उद्दीपन हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में उल्लेख है कि जो सब उपनिषद् आदि वैदिक शास्त्रों के अध्ययन के लिए भगवान् ब्रह्मा द्वारा आयोजित पुण्य गोष्ठी में एकत्र हुए थे वे सब यदुवंश शिरोमणि श्रीकृष्ण के प्रेम से भाव-विह्वल हो उठे। वास्तव में उपनिषदों के स्वाध्याय का उद्देश्य भगवान् के तत्त्व को जानना है। संसार का निराकरण तो उपनिषदों का केवल एक आनुषंगिक विषय है। दूसरा विषय है निर्विशेष साक्षात्कार के बाद निर्विशेष ब्रह्म का उल्लंघन करने पर जब कोई भगवान् के संग में आता है तब उपनिषदों के स्वाध्याय का परम प्रयोजन सिद्ध होता है। भगवान् के चरणों में अर्पित तुलसी को सूँघना, उनके शंख की ध्वनि को सुनना, गोवर्धन जैसे पुण्य पर्वत, वृन्दावन जैसे पुण्य वन को देखना; गंगा तट पर जाना; खाना, सोना, मैथुन और भय—इन शारीरिक आवश्यकताओं को जीत लेना; काल के सर्वसंहारत्व को जानना; कृष्ण- भावना परायण भक्तों से निरन्तर संग करना—ये सब संत पुरुषों को शान्तरस में आरूढ़ कर भक्तिरस की उच्च अवस्था में पहुँचा सकते हैं इसलिये इन्हें शान्तरस के विभाव कहा जाता है। श्रीमद्भागवत (३.१५.४३) में सनकादि चार कुमारों का एक वाक्य है। उसके अनुसार जब वे वैकुण्ठ लोक में भगवान् का दर्शन करने के

शान्तरस [ २४६ लिये गये तो उन्हें प्रणाम करने के लिये झुकने पर भगवान् के चरणकमल के जल से मिश्रित तुलसी की सुगन्ध ने उनकी नासिका में प्रवेश किया और तुरन्त उनके चित को आकृष्ट कर लिया। यद्यपि ये चारों संत पुरुष निरन्तर निर्विशेष ब्रह्म में लीन रहते थे; परन्तु भगवान् के संग से और तुलसी को सूँघने से उनके शरीर में तुरन्त रोमांच हो आया। यह सिद्ध करता है कि ब्रह्म साक्षात्कार को प्राप्त पुरुष भी यदि शुद्धभक्ति परायण भक्तों का संग करे तो वह भी अविलम्ब भगवान् के सविशेष साकार रूप की ओर आकृष्ट हो जायगा। भक्तियोग के शान्तरस में सिद्ध महर्षियों के लक्षण अर्थात् अनुभाव इस प्रकार हैं—वे अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग में स्थिर रखते हैं और अवधूतों के समान चेष्टा करते हैं। अवधूत उस उच्च कोटि के योगी को कहा जाता है जो किसी सामाजिक, धार्मिक अथवा वैदिक परिपाटी को नहीं मानता। वे देख-देख कर चलते हैं; बोलते हैं तो ज्ञानमुद्रा का प्रदर्शन करते हैं, अर्थात् तर्जनी और अंगूठे को जोड़े रहते हैं। वे नास्तिकों से द्वेष नहीं करते और न ही भक्तों में अधिक रुचि रखते हैं। ऐसे पुरुषों के लिए मुक्ति और विषयपरायण जीवन से अनासक्ति का बहुत महत्त्व है। वे निरन्तर उदासीन बने रहते हैं और उनमें ममता और अहंमता का अभाव रहता है। वे बहुत गम्भीर और मौन रहते हैं; परन्तु उनके विचार पूर्ण रूप से भगवान् पर केन्द्रित रहते हैं। इन असाधारण अनुभावों का विकास शान्तरस में स्थित भक्तों में होता है। नासिका के अग्रभाग में दृष्टि को केन्द्रित करने के सम्बन्ध में 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में एक भक्त का कथन है। 'किसी योगी को ऐसा करते देखकर वह बोला, "यह योगी अपनी दृष्टि को नासाग्र में एकाग्र कर रहा है। इससे प्रतीत होता है कि इसे अपने अन्तर में भगवान् के शाश्वत् रूप का साक्षात्कार हो चुका है।' कभी-कभी शान्तरस में भक्त जँहाई लेता है, अंगड़ाई लेता है, किसी को उपदेश करता है, भगवान् के स्वरूप को प्रणाम करता है, प्रार्थना करता है और अपने शरीर से प्रत्यक्ष रूप से उनकी सेवा करना चाहता है। ये शान्तरस में स्थिर भक्तों के कुछ साधारण लक्षण हैं। किसी भक्त को जँहाई लेते देखकर अन्य भक्त कहने लगा, 'हे योगी ! लगता है तुम्हारे हृदय में कुछ भक्तिरस अवश्य है जिस कारण तुम जँहाई ले रहे हो।" शान्तरस में कभी-कभी पाया जाता है कि भक्त भूमि पर लोटने लगता है, उसे रोमांच हो उठता है और सम्पूर्ण शरीर कांपने

२५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु लगता है। इस प्रकार प्रेमसमाधि के विभिन्न लक्षण इन भक्तों में स्वतः प्रकाशित हो जाते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में उल्लेख है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण अपने पाञ्चजन्य शंख का वादन कर रहे थे तो कन्दरावासी महर्षियों ने तुरन्त प्रतिक्रिया की। इससे उनकी समाधि खुल गई थीं। उन्होंने देखा कि उनके शरीर में रोमांच हो आया है। कभी-कभी शान्तरस में भक्तगण निर्वेद, शान्ति, हर्ष, मति, स्मृति, विषाद, हर्ष, आवेग और वितर्क आदि संचारि- भावों को अभिव्यक्त करते हैं। एक आत्मज्ञानी विषाद से तुरन्त कम्पित हो उठा। वह सोच रहा था कि उसके समय का अपव्यय हो रहा है। भाव यह है कि ऋषि को शोक हुआ कि भगवान् द्वारका में स्वयं विराजमान हैं, परन्तु फिर भी ध्यान में मग्न होने के कारण वह उनके दर्शनों से वंचित है। जब कोई योगी सब प्रकार के मनोधर्मों से मुक्त होकर ब्रह्मभूत हो जाता है तो उसकी अवस्था को देहात्मबुद्धि से परे समाधि कहा जाता है। उस अवस्था में जब वह भगवान् की दिव्य लीला कथा को सुनता है तो देह पुलकित हो उठती है। ब्रह्म-साक्षात्कार के द्वारा निर्विकल्प समाधि की अवस्था को पहुँचा भक्त जब भगवान् श्रीकृष्ण के शाश्वत् स्वरूप के संस्पर्श में आता है तो उसका दिव्य आनन्द अनन्त गुणा बढ़ जाता है। एक महर्षि ने किसी दूसरे से जिज्ञासा की थी, "हे सखे ! क्या तुम समझते हो कि जब मेरे अष्टांगयोग की सिद्धि हो जायेगी तो मैं भगवान् के शाश्वत् रूप को देख सकूँगा ?" यह शान्तरस में स्थित भक्त की जिज्ञासा का उदाहरण है। सूर्यग्रहण के अवसर पर जब भगवान् श्रीकृष्ण अपने अग्रज बलराम और बहन सुभद्रा को साथ लेकर रथ पर सवार होकर कुरुक्षेत्र पधारे तो बहुत से ध्यानयोगी भी वहाँ आये। जब इन योगियों ने भगवान् कृष्ण- बलराम को देखा तो वे कह उठे कि अब जबकि उन्होंने भगवान् की अनु- पम विग्रह ज्योति को देख लिया है, वे निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार से मिलने वाले दिव्य सुखको भुला बैठे हैं। इस सन्दर्भ में ही एक योगी ने श्रीकृष्ण के पास जाकर कहा, "हे प्रभो ! आप सब दिव्य अवस्थाओं से परे अप्राकृत आनन्द से परिपूर्ण हैं। अतएव दूर से आपको देख लेने मात्र से ही मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच गया हूँ कि मेरे लिये निर्विशेष ब्रह्म के आनन्द में स्थित होने की कोई आवश्यकता नहीं है।" जब एक महान् योगी को श्रीकृष्ण के पाञ्चजन्य शंख की ध्वनि ने

शान्तरस [ २५१ ध्यानसमाधि से जगा दिया तो वह अविभूत हो उठा, इतना अधिक कि वास्तव में अपने सिर को भूमि पर बजाने लगा । उसकी आँखें प्रेमभाव के अश्रुओँ से भर आईं और वह अपने योग-अभ्यास के सारे विधि-विधान का उल्लंघन कर बैठा । इस प्रकार उसने ब्रह्म-साक्षात्कार की पद्धति की एकदम उपेक्षा कर दी । बिल्वमंगलठाकुर अपने ग्रन्थ 'कृष्णकर्णामृत' में कहते हैं—'निर्वि- शेषवादी चाहें तो निर्विशेष ब्रह्म को भजते रहें। यद्यपि मैं पहले ब्रह्म- साक्षात्कार के पथ पर दीक्षित हुआ था । पर अब एक नटखट बालक द्वारा मार्गभ्रष्ट हो चुका हूँ, जो बहुत चंचल है और गोपियों में अत्यासक्त है। अब उसी ने मुझे अपना दास बना लिया है। ऐसे में मुझे ब्रह्मसाक्षात्कार के पथ का विस्मरण हो गया है।" बिल्वमंगल ठाकुर पहले परतत्त्व के ब्रह्मसाक्षात्कार में दीक्षित थे। परन्तु बाद में वृन्दावन में श्रीकृष्ण का संग करके वे कुशल भक्त बन गये । यही शुकदेव गोस्वामी के साथ हुआ । वे भी भगवान् की कृपा से निर्विशेष ब्रह्म के पथ को छोड़कर भक्तिमार्ग में आ गये । शुकदेव गोस्वामी और बिल्वमंगल ठाकुर, ये दोनों ही परतत्त्व के निर्विशेष स्वरूप को छोड़ कर भक्तिमार्ग में आये थे। अतएव ये शान्तरस में स्थित भक्तों के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। कुछ अधिकारियों के अनुसार इस अवस्था को रसों के अन्तर्गत नहीं माना जा सकता । परन्तु श्रील रूपगोस्वामी कहते हैं कि चाहे कोई इसे रस न भी माने; परन्तु यह तो मानना ही होगा कि इससे भक्तियोग का प्रारम्भ होता है। परन्तु यदि कोई इसके आगे भगवान् की वास्तविक सेवा की ओर नहीं बढ़ता तो उसे रस के स्तर पर नहीं समझा जा सकता । इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव को स्वयं यह उपदेश दिया है, "स्थिर अवस्था में मेरे निज रूप में निष्ठा होती है। उसका नाम शान्तरस है।" इस अवस्था में स्थिति के बिना कोई भी शुद्ध भक्तियोग नहीं कर सकता । भाव यह है कि कम से कम शान्तरस में स्थित हुए बिना कोई भी भगवान् के निज रूप में निष्ठ नहीं हो सकता ।

अध्याय ३६ प्रीतिभक्तिरस श्रीधर स्वामी जैसे आचार्यों ने प्रीति को भक्तिरस का एक सिद्धरूप माना है। यह ठीक शान्तरस के ऊपर है और दास्यरस के विकास के लिये अनिवार्य है। 'नामकौमुदी' नामक शास्त्र में इस अवस्था को श्रीकृष्ण के लिये रति स्थायिभाव माना है। शुकदेव आदि आचार्य प्रीति की अवस्था को शान्तरस में मानते हैं। चाहे जो हो, इस प्रीति का भक्तजन नाना स्वादों में आस्वादन करते हैं। इसलिये इसका सामान्य नाम प्रीति है अर्थात् श्रीकृष्ण के लिये शुद्ध रति। दास्यभाव वाले भक्त श्रीकृष्ण में सम्भ्रम प्रीति रखते हैं । गोकुल (इस लोक में वृन्दावन ) के कुछ निवासी श्रीकृष्ण में इसी प्रकार का स्नेह रखते हैं। वृन्दावनवासी कहते हैं, "श्रीकृष्ण निरन्तर हमारे सामने घनश्यामाकृति में अभिव्यक्त रहते है । उन्होंने अपने करारविन्द में अद्भुत वंशी धारण कर रखी है। पीताम्बर में सुशोभित हैं। सिर पर मोरमुकुट धारी हैं । जब श्रीकृष्ण इस सब निज रूप में गोवर्धन के निकट चलते है तो स्वर्ग और पृथ्वी के सारे निवासियों को दिव्य आह्लाद का अनुभव होता है और वे सब अपने को उनका शाश्वत् दास समझते हैं।" विष्णु श्रीकृष्ण के समान ही वस्त्र धारण किये रहते हैं और उनका वर्ण भी वही है। इसलिये कभी-कभी भक्त उनके चित्र को देखकर भी उसी सम्भ्रम और गौरव भाव से भर जाते हैं। दोनों में भेद केवल इतना है कि विष्णु चतुर्भुज हैं, जिनमें वे शंख, चक्र, गदा, और पद्म, धारण किये रहते हैं। इसके अतिरिक्त वे चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त आदि अनेक अमूल्य रत्नों से सुशोभित हैं। श्रीरूप गोस्वामी के 'ललितमाधव' में श्रीकृष्ण के दास का यह वाक्य है—"निःसन्देह कौस्तुभ मणि से युक्त होने के कारण भगवान् विष्णु बड़े सुन्दर हैं। अपने चारों हाथों में उन्होंने शंख, चक्र, गदा और पद्म

प्रीतिभक्तिरस [ २५३ धारण किये हुए हैं और उनकी रत्नराशि देदीप्यमान है। गरुड़ पर विराजमान अपनी शाश्वत् अवस्था में वे बड़े ही भव्य लगते हैं। परन्तु अब वही भगवान् विष्णु इस समय कंस के शत्रु हैं और उनके इस निज रूप ने मुझे वैकुण्ठ के सारे ऐश्वर्यों को भुला दिया है।” एक दूसरे भक्त ने कहा है- “हे भगवन् ! जिनके रोमकूपों से निरन्तर करोड़ों ब्रह्माण्डों का नित्य उदय होता रहता है, जो कृपा के सागर हैं, अचिन्त्य शक्तिशाली हैं, सर्वसिद्धिमय सब अवतारों के बीज वही श्रीभगवान् परम ईश्वर, परम आराध्य, परम सर्वज्ञ, दृढ़ व्रत वाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से पूर्ण, क्षमा के सागर तथा शरणागत जीवों के रक्षक हैं। वे उदार, सत्यप्रतिज्ञ, दक्ष, मंगलमय, बलशाली, शास्त्रों के अनुगामी, भक्तों के मित्र, वदान्य, तेजोमय, युक्त, कृतज्ञ, कीर्ति के आश्रय, मान्य, धर्मात्मा, सम्पूर्ण बल के निधान तथा प्रेम के वश में होने वाले हैं। अपनी ओर दास्यभाव से आकृष्ट भक्तों के एकमात्र वही आश्रय हैं।” भगवान् के दास चार प्रकार के होते हैं- अधिकृत (जैसे ब्रह्मा, शिव आदि, जो रजोगुण और तमोगुण पर नियंत्रण के लिये नियुक्त किये गये हैं), आश्रित भक्त, नित्यपार्षद तथा वे भक्त जो निरन्तर केवल भगवान् ही के अनुगामी हैं। अधिकृत सेवक श्रीकृष्ण की अर्द्धांगिनी जाम्बवती और कालिन्दी के बीच परस्पर वार्ता हो रही थी। जाम्बवती ने पूछा, “यह कौन हमारे श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा कर रही है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “यह अम्बिका है। अम्बिका अर्थात् पार्वती, जिसके हाथ में सारे ब्रह्माण्ड की व्यवस्था है।” फिर जाम्बवती ने पूछा, “यह कौन है जो श्रीकृष्ण को देखकर काँप रहा है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “ये भगवान् शिव हैं।” फिर जाम्बवती बोली, “यह कौन प्रार्थना कर रहा है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “ये ब्रह्मा हैं।” जाम्बवती बोली, “फिर कौन है जो भूमि पर गिर कर श्रीकृष्ण को दण्डवत् करता है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “देवराज इन्द्र।”

१५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जाम्बवती ने आगे पूछा, "यह कौन है जो देवताओं के साथ आया है और उनके साथ हँस रहा है ?" कालिन्दी बोली, "ये मेरे अग्रज यमराज हैं, जो मृत्यु के अधिष्ठाता हैं।" इस वार्ता से पता चलता है कि यमराज सहित सारे देवता भगवान् की सेवा में नियुक्त हैं। इन्हें अधिकृत देवता कहा जाता है। आश्रित भक्त एक वृन्दावनवासी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण ! हे वृन्दावन के आनन्द ! इस संसार से डर कर हमने आपकी शरण ली है क्योंकि आप हमारी रक्षा करने में पूर्ण समर्थ हैं। हमें आपको महिमा भलीभाँति ज्ञात है; इसलिये हमने मुक्ति की इच्छा को छोड़कर आपके चरणकमलों का पूर्ण आश्रय ग्रहण कर लिया है। आपके नित्य वर्धनशील प्रेम की कथा को सुनकर हम स्वेच्छा से आपकी दिव्य सेवा में संलग्न हो गये हैं।" यह भगवान् श्रीकृष्ण के एक आश्रित भक्त का वाक्य है। जब यमुना में निवास कर रहे कालिय नाग के सिर पर निरन्तर श्रीकृष्ण के चरणों का आघात हुआ तो उसे बोध हो आया और उसने स्वीकार किया, "हे नाथ ! मैंने आपका कितना अपराध किया, परन्तु फिर भी हे दयामय ! आपने कृपापूर्वक अपने चरणचिह्न को मेरे मस्तक पर अंकित कर दिया है।" यह भी श्रीकृष्ण के चरणारविन्द के आश्रित का ही उद्गार है। 'अपराधभंजन' में एक शुद्धभक्त कहता है, "हे नाथ ! मुझे यह कहते हुए लज्जा का अनुभव होता है कि आज तक मैंने काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मात्सर्य रूपी स्वामियों का आज्ञापालन किया है। कभी-कभी तो ऐसा करने में मुझे बिल्कुल निकृष्ट आचरण तक करना पड़ा है। मैंने उनकी सेवा बड़े ही निश्छलभाव सेकी है। निरन्तर उनका आज्ञापालन किया है। परन्तु फिर भी वे तृप्त नहीं हुए और न ही मुझे अपनी सेवा से मुक्त करते । इस प्रकार मुझसे सेवा कराने में उन्हें लज्जा भी नहीं आती । परन्तु हे यदुनाथ ! अब मुझे समझ आ गई है और इसलिये अब मैं उनको छोड़कर अभय प्रदान करने वाले आपकी शरण में आया हूँ। इसलिये मुझे अपनी सेवा में नियुक्त कीजिये।" यह शरणागत होकर श्रीकृष्ण के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने का उदाहरण है। वैदिक शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब शुष्क ज्ञान के द्वारा

प्रीतिभक्तिरस [ २५५ मुक्ति के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति इस पद्धति को छोड़कर पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण के चरणकमलों के आश्रित हो गये हैं। नैमिषारण्य के शौनक आदि ऋषि इसके अच्छे उदाहरण हैं। विद्वान् उन्हें पूर्ण ज्ञानी भक्त मानते हैं। 'हरिभक्तिसुधोदय' में एक वाक्य है जिसमें ये सब महान् ब्राह्मण शौनक ऋषि की अध्यक्षता में सूत गोस्वामी से कहते हैं—"हे महात्मन् ! देखिये यह कैसा आश्चर्यजनक है। यद्यपि हम संसार के कितने ही दोषों से दूषित थे; परन्तु आपसे केवल भगवान् की वार्ता करने से शनैःशनैः मुक्ति तक की इच्छा से छूटते जा रहे हैं।" 'पद्यावली' में एक भक्त कहता है, "जो स्वरूप-साक्षात्कार के लिये शुष्क ज्ञान में आसक्त हैं, जिनका निश्चय है कि परम सत्य ध्यान से परे है और इस प्रकार जो सत्त्वगुण में सिद्ध हो गये हैं, वे शान्ति से अपना कार्य करते रहें। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम तो केवल श्रीभगवान् में आसक्त हैं, जो स्वभाव से ही परम मधुर हैं। जिनका घनश्याम मेघ वर्ण है और जो पीताम्बरधारी हैं एवं जिनके नेत्र उत्फुल्ल कमलदल के समान हैं, हमें केवल उनके ध्यान की ही अभिलाषा है।" जो स्वरूप-साक्षात्कार के प्रारम्भ से ही भक्तियोग में आसक्त हैं वे सेवानिष्ठ कहलाते हैं । सेवानिष्ठता का अर्थ है केवल भक्तियोग में आसक्ति। इसके उत्तम उदाहरण—शिव, इन्द्र, बहुलाश्व, राजा इक्ष्वाकु, श्रुतदेव, पुण्डरीक आदि भक्त हैं। एक भक्त ने कहा है, "हे भगवान् ! आपके दिव्य गुण जीवनमुक्त पुरुषों को भी आकृष्ट करके भक्तों की गोष्ठ में ले जाते हैं, जहाँ निरन्तर आपकी कीर्ति का गान हुआ करता है। यहाँ तक किएकान्तवासप्रिय महर्षिजन भी आपकी कीर्ति के गान से वशीभूत हो जाते हैं। आपकी इस सम्पूर्ण दिव्य गुणावली से आकृष्ट होकर मैंने भी निश्चय किया है कि अपना सम्पूर्ण जीवन आपकी प्रेममयी सेवा में लगा दूँगा।" नित्यपार्षद द्वारका नगरी में निम्नलिखित भक्त श्रीकृष्ण के अन्तरंग पार्षद हैं— उद्धव, दारुक, सात्यकी, श्रुतदेव, शत्रुजीत, उपनन्द तथा भद्र। ये सब भगवान् के सचिवों के समान उनके साथ रहते हैं। परन्तु कभी-कभी उनका निजी सेवाकार्य भी करते हैं। कुरुवंश में भीष्म महाराज, परीक्षित तथा विदुर भी भगवान् श्रीकृष्ण के अंतरंग पार्षद माने जाते हैं। कहा है, "श्रीकृष्ण के सारे पार्षदों के शरीर दिव्य कान्ति से युक्त हैं तथा

२५६ । भक्तिरसामृतसिन्धु नेत्र कमलदल के समान प्रफुल्ल हैं। वे देवताओं की शक्ति को भी निरस्त कर सकते हैं। विशेष रूप से अमूल्य रत्नों से विभूषित रहते हैं।" जब श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ में थे तो किसी ने उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया— "हे नाथ ! उद्धव आदि आपके निजपार्षद द्वारका के द्वार पर खड़े निरन्तर आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा करते रहते हैं। उनके नेत्र प्रायः अश्रुधारा से पूर्ण रहते हैं। अपने सेवाभाव के उत्साह में वे शिवजी की प्रलयाग्नि से भी नहीं डरते। वे पूर्ण रूप से आपके चरणकमलों के शरणागत हैं देव !" श्रीकृष्ण के बहुत-बहुत से अन्तरंग पार्षदों में से उद्धव को सर्वोत्तम माना जाता है। उनका विवरण इस प्रकार है—उनके शरीर का वर्ण ठीक कालिन्दी के रंग जैसा है और उसी के समान शीतल है। वे निरन्तर श्रीकृष्ण द्वारा पहनी माला को धारण किये रहते हैं। उनके वस्त्र भी श्रीकृष्ण के समान ही पीतवर्ण हैं। उनके भुजदण्ड अर्गला के समान लम्बे और स्थूल हैं तथा नेत्र ठीक कमलदल जैसे हैं। ऐसे भक्तों और पार्षदों में सर्वप्रधान उद्धवजी के चरणकमलों में हम सादर प्रणाम करते हैं।" उद्धव ने भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों का वर्णन इस प्रकार किया है—"भगवान् श्रीकृष्ण, जो हमारे स्वामी और आराध्य देव हैं, ब्रह्मा, शिव और सम्पूर्ण जगत् के नियन्ता हैं। वे अपने पितामह उग्रसेन से आदेश ग्रहण करते हैं। वे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के स्वामी हैं; परन्तु फिर भी उन्होंने सागर से थोड़ी भूमि माँगी। विद्या के सागर होते हुए भी वे मुझे तुच्छ से कभी-कभी परामर्श लेते हैं। वे इतने महान् और वदान्य हैं; फिर भी अपनी नाना क्रियाओं में साधारण मनुष्य के समान संलग्न हैं।" भगवान् के अनुगामी (अनुग) .. जो निरन्तर भगवान् की निज सेवा में लगे रहते हैं, उन्हें अनुग कहा जाता है। इसके उदाहरण सुचन्द्र, मण्डल, स्तम्ब, सुतम्ब आदि हैं। ये सब द्वारकानिवासी हैं और अन्य पार्षदों के समान ही वस्त्रालंकरों से सुशोभित हैं। अनुग भिन्न-भिन्न प्रकार की विशिष्ट सेवाओं में नियुक्त रहते हैं। मण्डन सदा श्रीकृष्ण के सिर पर छत्र धारण किये रहता है। सुचन्द्र चँवर डुलाता है, और सुतम्ब ताम्बूल अर्पण किया करता है। ये सभी महाभागवत हैं और निरन्तर भगवान् की प्रेममयी दिव्य सेवा में संलग्न रहते हैं। जैसे द्वारका में अनुग हैं, वैसे ही वृन्दावन में भी अनेक अनुग हैं।

प्रीतिभक्तिरस [ २५७ इनके नाम इस प्रकार हैं—रक्तक, पत्रक, पत्री, मधुकण्ठ, मधुव्रत, रसाल, सुविलास, प्रेमकन्द, मरन्दक, आनन्द, चन्द्रहास, पयोद, बकुल, रसद तथा शारद। वृन्दावन के अनुगों के रूप का वर्णन इस प्रकार है—"हम नन्द- नन्दन के नित्य अनुगों की सादर वन्दना करते हैं। वे निरन्तर वृन्दावन में वास करते हैं और उनके शरीर रत्नों के हार और कंचन किंकिणियों से सुशोभित हैं। वे भ्रमर और स्वर्णिम चन्द्र की सी कान्ति से युक्त हैं और उनके परिधान अपने-अपने विशेष रंग रूप के अनुरूप हैं।" उनकी विशेष-विशेष सेवाओं को यशोदा मैय्या के इस वाक्य से समझा जा सकता है—'बकुल ! श्रीकृष्ण के पीताम्बर का परिमार्जन करो। वारिद तुम उनके स्नान जल को अगुरु से सुगन्धित करो। रसाल को ताम्बूल तैयार करना है। तुम सब देख सकते हो कि श्रीकृष्ण आ रहे हैं। चारों ओर धूल छा गई है और दूर से गाय भी दृष्टिगोचर होती हैं।'" सारे अनुगों में रक्तक को प्रधान माना जाता है। उसके रूप का वर्णन इस प्रकार है—"सुन्दर पीताम्बर को धारण किये हुए, अपने अंगों की श्यामल कान्ति से दुरुवादल की कान्ति को लज्जित करने वाले, राग- विद्या में निपुण कंठ से युक्त तथा गोकुल के युवराज कृष्ण की अच्छी प्रकार से सेवा करने वाले रक्तक नामक प्रधान अनुचर का मैं अनुगमन करता हूँ।" रक्तक का श्रीकृष्ण में कसा अनुराग था, इसका एक उदाहरण रसद से उसके वाक्य द्वारा समझा जा सकता है, "हे मित्र सुनो ! मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मैं निरन्तर गिरिवरधारी व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण की सेवा में संलग्न रह सकूँ।" श्रीकृष्ण की निज सेवा के परायण भक्त निरन्तर बड़े सावधान रहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि भगवान् का निजी सेवक बन जाना कोई साधारण बात नहीं है। श्रीकृष्ण की सेवा में लगी हुई चींटी को भी प्रणाम करने वाला शाश्वत् सुख को प्राप्त हो जाता है। फिर उसका क्या कहना है जो साक्षात् श्रीकृष्ण की सेवा के परायण हो। रक्तक ने एक बार अपने अन्तर में कहा था, “जिस प्रकार श्रीकृष्ण मेरे आराध्य और देव हैं उसी प्रकार उनकी ये सखी गोपांगनाएँ भी मेरे लिये सेव्य और आराध्य हैं। गोपियाँ ही क्यों, जो कोई भी मेरे प्रभु की सेवा में संलग्न हो वह भी मेरे लिये आराध्य होगा। मैं जानता हूँ कि मुझे सावधानीपूर्वक इस अभिमान से बचना चाहिये कि मैं भगवान् के सेवकों और दासों में से एक हूँ।" इस वाक्य से समझा जा सकता है कि शुद्धभक्त, जो वास्तव में भगवान् की

२५८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सेवा के परायण हैं, वे निरन्तर इस बात का ध्यान रखते हैं कि उन्हें कभी अपनी सेवा का अभिमान न हो जाए । श्रीकृष्ण के सीधे सेवक के ऐसे मनोभाव को 'धुर्य' कहते हैं । श्रीकृष्ण के पार्षदों का कुशल विशलेषणात्मक अध्ययन करके श्रील रूप गोस्वामी ने उन्हें धुर्य, धीर और वीर—इन तीन श्रेणियों में माना है। रक्तक धुर्य श्रेणी में हैं—अर्थात् जो निरन्तर श्रीकृष्ण की परम प्रेयसी गोपियों की सेवाओं में अनुरक्त रहते हैं । श्रीकृष्ण का एक धीर पार्षद सत्यभामा की धात्री का पुत्र है। सत्यभामा द्वारका में श्रीकृष्ण की पट्टमहिषियों में से एक हैं और जब श्रीकृष्ण से उनका विवाह हुआ तो उनकी धात्री के पुत्र को भी उनके साथ जाने दिया गया, क्योंकि वे बाल्यकाल से भाई-बहन के समान साथ-साथ रहे थे । अतएव यह सत्यभामा की धात्री का पुत्र श्रीकृष्ण के साथ उनके साले के समान रहता था और कभी-कभी इस सम्बन्ध से वह श्रीकृष्ण के साथ परिहास भी कर बैठता । उसने एक समय श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण ! मैंने कभी तुम्हारी अर्धांगिनी श्रीदेवी की कृपा-प्राप्ति का प्रयत्न नहीं किया है। परन्तु फिर भी में इतना भाग्यवान् हूँ कि मुझे तुम्हारे कुल का सदस्य अर्थात् सत्यभामा का भाई माना जाता है।" वीरपार्षद एक वीर पार्षद ने अपने अभिमान को इस प्रकार अभिव्यक्त किया है—"भगवान् बलराम प्रलम्बासुर के महान् बलशाली शत्रु हों तो हों; परन्तु मुझे उनसे कोई भय नहीं । जहाँ तक प्रद्युम्न का सम्बन्ध है, मुझे उससे कुछ लेना-देना नहीं है, क्योंकि वह तो एक नन्हा सा बालक है । अतएव मुझे किसी से कोई आशा नहीं है । मुझे तो केवल श्रीकृष्ण का कृपाकटाक्ष चाहिये । फिर तो मैं श्रीकृष्णप्रिया सत्यभामा को भी कुछ नहीं गिनता ।" श्रीमद्भागवत (४.२०.२८) में महाराज पृथु भगवान् का सम्बोधन करते हुए कहते हैं—"हे नाथ ! मुझे लक्ष्मीदेवी के कोप की चिन्ता नहीं है । यदि वे मुझसे रुष्ट भी हो जायें तो कोई भय नहीं, कोई चिन्ता नहीं, क्योंकि मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है । आप बड़े ही दीनवत्सल हैं और अपने भक्तों की, अपने सेवकों की तुच्छ सेवा को भी बहुत मान लेते हैं। अतएव मुझे विश्वास है कि आप मेरी तुच्छ सेवा को भी स्वीकार करेंगे । हे नाथ ! आप आप्तकाम हैं । आप किसी की भी सहायता के बिना जो

प्रीतिभक्तिरस [२५६ चाहें कर सकते हैं। चाहे लक्ष्मी देवी मुझसे सन्तुष्ट न हों, मैं जानता हूँ कि आप सदा मेरी सेवा को स्वीकार करते रहेंगे।" भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में अनुरक्त भक्त तीन प्रकार के हो सकते हैं—शरणागत, भक्ति के ज्ञान में उन्नत, एवं पूर्ण रूप से सेवा- परायण । ऐसे भक्त क्रमशः साधक, सिद्ध और नित्यसिद्ध कहलाते हैं।

अध्याय ३७ श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा की प्राप्ति, उनके चरणकमल की रज की प्राप्ति, उनका प्रसाद, तथा उनके भक्तों का संग—ये वे कुछ उद्दीपन हैं जिनसे भक्त भगवान् की प्रेममयी सेवा में संलग्न होता है । भीष्म पितामह के देहत्याग के अवसर पर उपस्थित होकर श्रीकृष्ण ने अपनी अहैतुकी कृपा का परिचय दिया था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में पौत्र अर्जुन से हारकर भीष्मदेव शरशय्या पर विराज रहे थे । प्राकृत-जगत् से उनके प्रस्थान का समय निकट था। जब भगवान् श्रीकृष्ण, महाराज युधिष्ठिर तथा अन्य पाण्डव भीष्मदेव के निकट पहुँचे तो वे भगवान् श्रीकृष्ण से बड़े अनुगृहीत हुए और कृपाचार्य से कह उठे, “हे कृपाचार्य जी ! भगवान् श्रीकृष्ण की अद्भुत अहैतुकी कृपा का अवलोकन कीजिये । मैं परम अभागा हूँ, मुझमें कोई योग्यता नहीं। युद्ध में मैं श्रीकृष्ण के परम अंतरंग सखा अर्जुन का विरोध कर रहा था, यहाँ तक कि मैंने उसे मारने की भी पूरी चेष्टा की। मुझमें इतने अवगुण हैं, परन्तु भगवान् फिर भी इतने दयामय हैं कि वे जीवन के इस अन्तिम क्षण में मुझे मिलने आये हैं। वे सम्पूर्ण महर्षिवृन्द के आराध्य हैं। परन्तु फिर भी करुणावश मुझ जैसे अधम को दर्शन देने पधारे हैं।” कभी-कभी श्रीकृष्ण की वंशी और श्रृंग की ध्वनि, उनकी हँसी, भूमि पर उनके चरणचिह्नों के अंक, उनकी दिव्य सौरभ और उनके वर्ण के समान आकाश में नवोदित मेघ—ये सब भी कृष्णप्रेम के उद्दीपन का काम करते हैं। 'विदग्धमाधव' में उल्लेख है—श्रीकृष्ण को वेणु बजाते देखकर बल- देव ने बड़ी आतुरता से कहा, "देखो देखो, श्रीकृष्ण के दिव्य वेणुरव को सुनकर देवराज इन्द्र अपने स्वर्ग में रोने लगा। भूमि पर उसकी अश्रुधारा के गिरने से वृन्दावन देवताओं का दिव्य निवास लग रहा है।”

श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६१ कृष्णप्रेम में होने वाले अनुभाव इस प्रकार हैं—पूर्ण रूप से भगवान् की सेवा के परायण हो जाना; निष्ठा और श्रद्धापूर्वक उनकी आज्ञापालन में लगे रहना, पूर्ण रूप से प्रेममयी भगवत्सेवा में तत्पर होकर उद्वेग और ईर्ष्या से मुक्त हो जाना तथा श्रद्धा प्रेमसहित भगवान् की सेवा करने वाले भक्तों से मैत्री करना। ये सब लक्षण प्रेम के अनुभाव हैं। प्रेम के पहले लक्षण अर्थात् किसी विशेष सेवा में तत्पर रहने का प्रतीक दारुक है। यह श्रीकृष्ण का सेवक है और निरन्तर उन्हें चँवर डुलाया करता है। इस प्रकार सेवा करते-करते वह प्रेमभाव से ओत-प्रोत हो गया और प्रेम के लक्षण उसके शरीर पर प्रकट हो गये। परन्तु दारुक की अपनी सेवा में ऐसी निष्ठा थी कि उसने प्रेम की सब अभिव्यक्तियों को रोक लिया क्योंकि उसके विचार में इनसे उसके सेवा कार्य में बाधा पड़ रही थी। ये सब लक्षण अपने आप उदित हुए थे; परन्तु उसने इन्हें कुछ भी महत्त्व नहीं दिया। श्रीमद्भागवत (१०.८६.३८) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को अपने घर आया देख श्रुतदेव ब्राह्मण इतना आनन्दविह्वल हो उठा कि श्रीकृष्ण के चरणकमलों में प्रणाम करके हाथ उठा-उठाकर नाचने लगा। भगवान् श्रीकृष्ण का एक भक्त उन्हें सम्बोधित करते हुए कहने लगा, “हे नाथ ! यद्यपि आप वृत्तिक नाचने वाले नहीं हैं; परन्तु आपके नृत्य ने हमें इतना आश्चर्यचकित कर दिया है कि लगता है कि आप स्वयं अखिल नृत्यकला के गुरु हैं। निःसन्देह आप ने साक्षात् प्रेम की देवी से नाचना सीखा होगा।” जब कोई भक्त प्रेमभाव में भरकर नाचता है तो सात्त्विक भावों का उदय होता है। इन भावों को सात्त्विक कहने का तात्पर्य यह है कि वे शुद्ध सत्त्व के स्तर पर प्रकट होते हैं। ये प्राकृत भावना के लक्षण नहीं हैं, ये तो साक्षात् आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। श्रीमद्भागवत (१०.८५.३८) में शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं कि वामनदेव के चरणकमलों में अपना सर्वस्व अर्पण करके बलि महाराज ने तुरन्त उनके चरणों को पकड़ लिया और पकड़ कर अपने हृदय से लगा लिया। आनन्द विह्वल होने के कारण उनमें प्रेम के सारे दिव्य लक्षणों का उदय हुआ। उनकी वाणी कम्पित हो उठी और नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। प्रेमभाव की ऐसी अभिव्यक्तियों में अनेक गौण लक्षण भी होते हैं—जैसे हर्ष, गर्व, धृति, निर्वेद, विषण्णता, दैन्य, चिन्ता, स्मृति, शंका, मति, उत्सुकता, चपलता, वितर्क, आवेग, लज्जा, जाड्य, मोह, उन्माद,

२६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अवहित्था, बोध, स्वप्न, क्लम, व्याधि, मृत्यु इत्यादि । श्रीकृष्ण से संयोग होने पर भक्त में हर्ष, गर्व, धृति, आदि लक्षण होते हैं और जब उसे श्रीकृष्ण से अति विरह का अनुभव होता है तो मोह, व्याधि, मृत्यु आदि लक्षण प्रधान रहते हैं । श्रीमद्भागवत (१.११.५) में उल्लेख है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्ध से अपने घर द्वारका लौटे तो सारे द्वारकावासी उनसे उसी प्रकार वार्तालाप करने लगे जैसे कोई बालक विदेशों को गये पिता से घर लौटने पर प्रेमपूर्वक बात करता है। यह हर्ष का उदाहरण है । जब मिथिला नरेश बहुलाश्व ने श्रीकृष्ण को अपने महल में देखा तो उसने संकल्प किया कि वह कम से कम सौ बार उन्हें दण्डवत् प्रणाम करेगा। परन्तु वह प्रेम के भाव में ऐसा विभोर हुआ कि केवल एक बार प्रणाम कर के अपनी स्थिति को भूल गया और फिर वापस नहीं उठ सका । स्कन्दपुराण में एक भक्त भगवान् श्रीकृष्ण से कहता है, “हे स्वामिन् ! जैसे सूर्य अपने प्रबल तेज से भूमि के सारे जल को सुखा डालता है उसी प्रकार मेरी मनोव्यथा ने मेरे मुख और शरीर के सारे तेज को सुखा डाला है। इसका कारण केवल आपका विरह है। "यह प्रेम में क्लम का उदाहरण है । निर्वेद की अभिव्यक्ति देवराज इन्द्र के कथन में है। उसने सूर्यदेव को देखा तो कहने लगा, "हे सूर्य ! तुम्हारी ज्योति धन्य है क्योंकि यह श्रीकृष्ण के चरणकमलों तक पहुँच रही है, जो यदुवंश के नायक हैं। मेरे हजार नेत्र भी निरर्थक ही सिद्ध हुए हैं,क्योंकि एक क्षण के लिये भी ये भगवान् के चरणारविन्द को नहीं देख पाये ।" सम्भ्रम प्रीति उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होकर प्रेम में परिवर्तित हो जाती है। उससे आगे स्नेह और आगे बढ़कर राग का रूप धारण कर लेती है। श्रीमद्भागवत (१०.३८.६) में अक्रूर कहते हैं—"आज मेरे सब पापों का नाश हो गया है और जीवन धन्य-धन्य हो चुका है क्योंकि आज मैं योगियों के लिये ध्यान में भी दुर्लभ भगवान् के चरणकमलों को प्रणाम करूँगा ।" एक अन्य भक्त अपने सम्भ्रम प्रीतिभाव में कहने लगा, "मेरे जीवन में वह धन्यातिधन्य दिन कब होगा जब मैं यमुना तट पर भगवान् श्रीकृष्ण को गोपाल वेष में खेलते देख सकूँगा ।" जब इस प्रीति में ह्रास की शंका नहीं रहती उस समय भक्त प्रेम

श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६३

की अवस्था को प्राप्त हो जाता है। इस अवस्था में भक्त द्वारा अभिव्यक्त भावों को अनुभाव कहते हैं। बलि महाराज को जिस सम्भ्रम प्रीति का अनुभव हुआ था उसका वर्णन इस प्रकार है—"हे नाथ ! आपने एक साथ मुझे दण्डित भी किया है और मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा भी बरसाई है। अतएव यह निश्चित है कि यदि मैं आपके चरणकमलों के शरणागत हो जाऊँ तो फिर जीवन की किसी भी अवस्था में मुझे उद्वेग नहीं होगा। चाहे आप मुझे सारी यौगिक सिद्धियों को भोगने का अवसर दें अथवा नरक का भाग दें, मैं कभी उद्वेग में नहीं होऊँगा।" श्रीकृष्ण ने स्वयं बलि महाराज को देखने के बाद उद्धव से कहा, "हे सखे ! मैं बलि महाराज के गौरवमय चरित्र का वर्णन किस प्रकार करूँ ? यद्यपि भृगुनन्दन ने इसे शाप दिया और वामन अवतार में मैंने इससे छलपूर्वक ब्रह्माण्ड का साम्राज्य हरण कर लिया और अभी भी मैं प्रतिज्ञा को पूर्ण न करने के कारण इसकी निन्दा करता हूँ; फिर भी मैंने उसे देखा है और वह मेरे लिये प्रेम से पूर्ण है। मेरे लिए उसका प्रेम अब भी अभिव्यक्त हो रहा है।" प्रेम का यह भाव जब तीव्र हो उठता है तो उसे स्नेह कहते हैं। स्नेह की अवस्था में श्रीकृष्ण से क्षणभर का विरह भी नहीं सहा जा सकता। एक भक्त श्रीकृष्ण के सेवक दारुक से कहता है, "हे दारुक ! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि श्रीकृष्ण के विरह में तुम काष्ठवत् हो जाते हो। जब भी कोई भक्त श्रीकृष्ण को देखता है तो उसके नेत्र अश्रुधारा से भर जाते हैं; उनके विरह में तुम्हारे जैसा कोई भी भक्त कठपुतली के समान स्तम्भित खड़ा रह जाता है। इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है।" उद्धव के प्रेम-लक्षणों के सम्बन्ध में भी एक वाक्य है—"जब उन्होंने श्रीकृष्ण को देखा तो उसके नेत्र आँसुओं से भर आये, जिनके बहने से एक नदी बह चली, मानो कृष्णरूप समुद्र को समर्पण करने जा रही हो—उसी प्रकार जैसे पत्नी पति का अभिनन्दन करती है। रोमांच की अतिशयता के कारण उद्धव कदम्ब के पुष्प जैसे सुशोभित हो रहे थे। जब वे प्रार्थना करने लगे तो भक्तों के समूह में भी उनकी शोभा सबसे अधिक बढ़ गई।" स्नेह को जिस अवस्था में दुःख भी सुख प्रतीत होने लगता है उसको

२६४ भक्तिरसामृतसिन्धु राग कहते हैं। राग में सब प्रकार के दुःखों का शान्तिपूर्वक सामना करने की योग्यता आ जाती है। मृत्यु का भय उपस्थित होने पर भी ऐसा भक्त भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा से अपने को वंचित नहीं करता। प्रेम का गौरवमय उदाहरण राजा परीक्षित ने उपस्थित किया है। उनकी मृत्यु आसन्न थी और वे सम्पूर्ण विश्व में फैले अपने राज्य से वंचित हो चुके थे। जीवन के शेष सात दिनों में उन्होंने जल की एक बूँद भी ग्रहण नहीं की थी। फिर भी शुकदेव गोस्वामी से भगवान् की दिव्य लीलाकथा को सुनते हुए उन्हें लेशमात्र भी दुःख न था। इसके विपरीत, वे शुकदेव गोस्वामी के संग में प्रत्यक्ष दिव्य आनन्द का अनुभव कर रहे थे। एक भक्त का विश्वास इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है—"यदि मुझे श्रीकृष्ण की कृपा का एक बिन्दु भी मिल जाये तो फिर मैं अग्नि अथवा सागर से घिरा होने पर भी सब प्रकार से चिन्तामुक्त रहूँगा। परन्तु यदि मैं उनकी अहैतुकी कृपा से वंचित रहूँ तो फिर द्वारका का राजा बन जाने पर राज्य का सिंहासन भी मेरे लिये कुशकंटक के समान होगा।" महाराज परीक्षित और उद्धव जैसे सब भक्त स्नेह के आधार पर राग में स्थित हैं। इस प्रकार के स्नेह में सख्यभाव का लेश प्रकाशित होता है। सब प्रकार के सांसारिक द्वेषों से मुक्त होने पर जब उद्धव को भगवान् का दर्शन हुआ तो उनका कण्ठ रुद्ध हो गया और वे कुछ न बोल सके। केवल अपने भ्रू-विलास से ही भगवान् का आलिंगन कर रहे थे। महान् विद्वानों ने ऐसी प्रीति को दो भागों में विभाजित किया है—अयोग तथा योग। यदि भक्त को साक्षात् श्रीकृष्ण का संग प्राप्त नहीं है तो उसे विद्वानों ने अयोग कहा है। इस प्रकार उनके प्रेम में चित्त निरन्तर उनके चरणकमलों में एकाग्रित रहता है। ऐसा भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण के दिव्य गुणगणों का अनुसन्धान किया करता है। उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण भगवान् का संग प्राप्त करना है। 'नृसिंहपुराण' में राजा इक्ष्वाकु के सम्बन्ध में एक वाक्य है—जिससे इस प्रेमभाव का उदाहरण मिलता है--' श्रीकृष्ण के प्रति अत्यन्त स्नेह के वश राजा इक्ष्वाकु काले मेघ, काले मृग की काली आँखों और कमल जिसको सदा भगवान् की आंखों की उपमा दी जाती है, इन सब पदार्थों में आसक्त हो गये।" श्रीमद्भागवत (१०.३८.१०) में अक्रूर सोचते हैं, "इस समय श्रीभगवान् साक्षात् इस धरती पर भार हरण के लिये विद्यमान हैं, और सबको अपने निज रूप में दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसे में जब हम उन्हें अपने सामने पाते हैं तो क्या यह हमारे नेत्रों की परम कृतार्थता नहीं

श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६५ है ?" भाव यह है कि अक्रूर को अनुभव हुआ कि नेत्रों की कृतार्थता श्रीकृष्ण के दर्शनों में ही है। अतएव जिस समय श्रीकृष्ण पृथ्वी पर साक्षात् दृश्यमान थे तो जिस किसी ने उन्हें देखा उसने नेत्रों की पूर्णता को प्राप्त कर लिया । बिल्वमंगल ठाकुर के 'कृष्णकर्णामृत' में प्रेम में उत्सुकता का यह उदाहरण—"कैसा दुर्भाग्य है ! हे हरे ! हे दीनबन्धु ! हे प्रिय कृष्ण ! तुम्हें देखे बिना इन अधन्य दिनों को मैं कैसे व्यतीत करूँ ? हाय कैसे व्यतीत करूँ ?" इसी प्रकार की भावना उद्धव ने श्रीकृष्ण को लिखे अपने एक पत्र में व्यक्त की है, "हे व्रजराज ! आप नेत्रों के लिये अमृतसिन्धु हैं । आपके चरणकमलों और अंगकांति को देखे बिना मुझे किसी भी प्रकार, किसी भी अवस्था में शान्ति नहीं मिलती । चित्त निरन्तर दुःख-सागर में मग्न रहता है । आपके विरह का एक-एक क्षण मेरे लिये युगों के समान हो गया है।" 'कृष्णकर्णामृत' में ही कहा है—"हे नाथ ! आप कृपा के सागर हैं । अत्यन्त दीनता के साथ बद्धाञ्जलि होकर मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ । क्या आप कृपया अपने कृपाकटाक्ष रूपी शीतल जल से मेरा सिंचन करेंगे ? इससे मुझे बड़ा सन्तोष होगा।" श्रीकृष्ण के एक भक्त ने कहा, "जब शशिशेखर शिव तक आपको नहीं देख सकते, फिर मुझ कीट से अधम के लिये क्या कहना । हे नाथ मैंने केवल पाप ही पाप किये हैं। मैं जानता हूँ कि मैं आपसे प्रार्थना करने के योग्य नहीं । परन्तु आपका एक नाम दीनबन्धु है । इसलिये आपसे प्रार्थना है कि कृपया अपने दिव्य कृपाकटाक्ष की किरण से अभिषिक्त करके मुझे शुद्ध कर दें । मेरी रक्षा तभी हो सकती है जब मैं पूर्ण रूप से आपके कृपाकटाक्ष में स्नान कर लूँ । अतएव हे नाथ ! कृपा करें।"

अध्याय ३८ निर्वेद तथा वियोग महाभागवत उद्धव ने एक बार श्रीकृष्ण को यह पत्र लिखा-“हे कृष्ण ! मैंने अभी-अभी नाना प्रकार के दर्शन-ग्रन्थों और, वैदिक श्रुतियों का अध्ययन समाप्त किया है, जो जीवन के लक्ष्य का वर्णन करते हैं। अपने इस अध्ययन से मुझे प्रसिद्धि भी मिली है; परन्तु फिर भी मेरे इस ज्ञान को धिक्कार है क्योंकि यद्यपि मैं वैदिक ज्ञान की ज्योति का ओस्वादन कर रहा हूँ परन्तु आपके चरण नखांकुर से प्रस्फुटित द्युति का रसास्वादन नहीं कर पाया। अतएव मेरा यह अभिमान और वैदिक ज्ञान जितनी शीघ्र समाप्त हो जाये, अच्छा है।” यह निर्वेद का उदाहरण है। एक अन्य भक्त ने बड़ी आतुरता से अपने भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है—“हे नाथ ! मेरा मन बड़ा अस्थिर है। इसलिये इसे मैं आपके चरणकमलों में एकाग्र करने में सफल नहीं हो पा रहा हूँ। अपनी इस अयोग्यता के कारण मुझे लज्जा आती है और सारी रात अपनी इस अयोग्यता पर शोक करते हुए मैं सो नहीं पाता।” यह चिन्ता है। ‘कृष्णकर्णामृत’ में विल्वमंगल ठाकुर ने अपनी चपलता इस प्रकार व्यक्त की है—“हे नाथ ! तुम्हारी शैशवकालीन चपलता त्रिभुवन में सबसे अद्भुत है। अब तुम स्वयं इसे जानते हो इसलिये मेरे मन की चंचलता को भी सहज समझ सकते हो। इसे केवल तुम जानते हो अथवा मैं। मैं तो बस यह जानने को उत्सुक हूँ कि किस प्रकार तुम्हारे चरणकमलों में मेरा मन एकाग्र हो सकता है।” एक अन्य भक्त अपने को उद्धत बताकर कहता है, “हे नाथ ! अपनी शूद्रता पर विचार किये बिना मैं आपके सामने स्वीकार करता हूँ कि मेरे नेत्र श्याम भ्रमरों के समान आपके चरणकमलों पर मंडराना चाहते हैं।” श्रीमद्भागवत (७.४.३७) में देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर को महाभागवत् प्रह्लाद महाराज की गाथा सुना रहे थे। प्रह्लादजी की

निर्वेद तथा वियोग [ २६७ स्वाभाविक भक्ति का प्रमाण इस बात से मिल जाता है कि जब वे नन्हें बालक थे तब भी उन्हें अपने सखाओं के साथ खेलना अच्छा नहीं लगता था। इसके स्थान पर वे सदा भगवान् की कीर्ति का प्रचार किया करते थे। अपने साथियों के खेलों में भाग लेने के स्थान पर वे जड़वत् समाधि में मग्न रहते, क्योंकि उनका ध्यान सदा श्रीकृष्ण पर था। अत- एव बाह्य जगत् उन्हें स्पर्श भी न कर सका। एक ब्राह्मण भक्त के सम्बन्ध में प्रसिद्ध उल्लेख है, "यह ब्राह्मण कर्मकाण्ड में बड़ा कुशल है पर न जाने क्यों यह अपलक नेत्र और निस्पंद देह को धारण किये हुए चित्रलिखित सा खड़ा है। लगता है उस विदग्ध वेणुवादन में रत कृष्ण की दिव्य माधुरी ने इसके मन को मोहित कर लिया है और उसके प्रति अनुरक्त होकर इसने अपनी दृष्टि को सामने घनश्याम मेघ पर लगा रखा है, जिससे इसे निरन्तर श्रीकृष्ण के विग्रह वर्ण का स्मरण हो रहा है।" यह प्रेमभाव में भक्त को होने वाली जड़ता का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (७.४.४०) में प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि अपने शैशव काल में भी जब वे भगवान् की कीर्ति का गायन करते तो निर्लज्ज पागल के समान नाच उठते। भगवान् की लीला के चिन्तन में पूर्ण रूप से निमग्न हो जाने के कारण कभी-कभी इन लीलाओं का अनुकरण भी करने लगते। यह भक्त के उन्माद का उदाहरण है। इसी प्रकार कहा जाता है कि देवर्षि नारद का श्रीकृष्ण में ऐसा भावोन्मत्त प्रेम था कि वे कभी-कभी नंगे नाचने लगते; कभी उनका पूर्ण शरीर स्तम्भित हो जाता; कभी वे जोर-जोर से हँसते और कभी उच्च स्वर से रुदन करने लगते; कभी वे एक दम चुप पड़ जाते और कभी व्याधिग्रस्त लगते, यद्यपि उन्हें कोई रोग नहीं था। यह भी भक्तिभाव में होने वाले उन्माद का उदाहरण है। 'हरिभक्तिसुधोदय' में उल्लेख है कि जब महाराज प्रह्लाद अपने को भगवान् के समीप जाने के अयोग्य समझ रहे थे तो वे दुःख के सागर में निमग्न हो गये और इस प्रकार आँसू बहाते हुए भूमि पर गिर पड़े और अचेतन हो गये। एक महान् भक्त के शिष्यों ने एक बार आपस में इसप्रकार कहा—'हे भाइयों ! हमारे गुरु महाराज श्रीकृष्ण के चरणकमलों को देखकर शोक की अग्नि में कूद पड़े हैं और इस अग्नि के कारण उनका चेतना रूपी जल बिल्कुल सूख गया है। अतः आओ उनके कर्णों में भगवन्नामामृत का प्रवेश करायें, जिससे उनके प्राणरूपी हंस फिर चेष्टा करने लगें।"