भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रीतिभक्तिरस [ २५५ मुक्ति के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति इस पद्धति को छोड़कर पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण के चरणकमलों के आश्रित हो गये हैं। नैमिषारण्य के शौनक आदि ऋषि इसके अच्छे उदाहरण हैं। विद्वान् उन्हें पूर्ण ज्ञानी भक्त मानते हैं। 'हरिभक्तिसुधोदय' में एक वाक्य है जिसमें ये सब महान् ब्राह्मण शौनक ऋषि की अध्यक्षता में सूत गोस्वामी से कहते हैं—"हे महात्मन् ! देखिये यह कैसा आश्चर्यजनक है। यद्यपि हम संसार के कितने ही दोषों से दूषित थे; परन्तु आपसे केवल भगवान् की वार्ता करने से शनैःशनैः मुक्ति तक की इच्छा से छूटते जा रहे हैं।" 'पद्यावली' में एक भक्त कहता है, "जो स्वरूप-साक्षात्कार के लिये शुष्क ज्ञान में आसक्त हैं, जिनका निश्चय है कि परम सत्य ध्यान से परे है और इस प्रकार जो सत्त्वगुण में सिद्ध हो गये हैं, वे शान्ति से अपना कार्य करते रहें। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम तो केवल श्रीभगवान् में आसक्त हैं, जो स्वभाव से ही परम मधुर हैं। जिनका घनश्याम मेघ वर्ण है और जो पीताम्बरधारी हैं एवं जिनके नेत्र उत्फुल्ल कमलदल के समान हैं, हमें केवल उनके ध्यान की ही अभिलाषा है।" जो स्वरूप-साक्षात्कार के प्रारम्भ से ही भक्तियोग में आसक्त हैं वे सेवानिष्ठ कहलाते हैं । सेवानिष्ठता का अर्थ है केवल भक्तियोग में आसक्ति। इसके उत्तम उदाहरण—शिव, इन्द्र, बहुलाश्व, राजा इक्ष्वाकु, श्रुतदेव, पुण्डरीक आदि भक्त हैं। एक भक्त ने कहा है, "हे भगवान् ! आपके दिव्य गुण जीवनमुक्त पुरुषों को भी आकृष्ट करके भक्तों की गोष्ठ में ले जाते हैं, जहाँ निरन्तर आपकी कीर्ति का गान हुआ करता है। यहाँ तक किएकान्तवासप्रिय महर्षिजन भी आपकी कीर्ति के गान से वशीभूत हो जाते हैं। आपकी इस सम्पूर्ण दिव्य गुणावली से आकृष्ट होकर मैंने भी निश्चय किया है कि अपना सम्पूर्ण जीवन आपकी प्रेममयी सेवा में लगा दूँगा।" नित्यपार्षद द्वारका नगरी में निम्नलिखित भक्त श्रीकृष्ण के अन्तरंग पार्षद हैं— उद्धव, दारुक, सात्यकी, श्रुतदेव, शत्रुजीत, उपनन्द तथा भद्र। ये सब भगवान् के सचिवों के समान उनके साथ रहते हैं। परन्तु कभी-कभी उनका निजी सेवाकार्य भी करते हैं। कुरुवंश में भीष्म महाराज, परीक्षित तथा विदुर भी भगवान् श्रीकृष्ण के अंतरंग पार्षद माने जाते हैं। कहा है, "श्रीकृष्ण के सारे पार्षदों के शरीर दिव्य कान्ति से युक्त हैं तथा