भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जाम्बवती ने आगे पूछा, "यह कौन है जो देवताओं के साथ आया है और उनके साथ हँस रहा है ?" कालिन्दी बोली, "ये मेरे अग्रज यमराज हैं, जो मृत्यु के अधिष्ठाता हैं।" इस वार्ता से पता चलता है कि यमराज सहित सारे देवता भगवान् की सेवा में नियुक्त हैं। इन्हें अधिकृत देवता कहा जाता है। आश्रित भक्त एक वृन्दावनवासी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण ! हे वृन्दावन के आनन्द ! इस संसार से डर कर हमने आपकी शरण ली है क्योंकि आप हमारी रक्षा करने में पूर्ण समर्थ हैं। हमें आपको महिमा भलीभाँति ज्ञात है; इसलिये हमने मुक्ति की इच्छा को छोड़कर आपके चरणकमलों का पूर्ण आश्रय ग्रहण कर लिया है। आपके नित्य वर्धनशील प्रेम की कथा को सुनकर हम स्वेच्छा से आपकी दिव्य सेवा में संलग्न हो गये हैं।" यह भगवान् श्रीकृष्ण के एक आश्रित भक्त का वाक्य है। जब यमुना में निवास कर रहे कालिय नाग के सिर पर निरन्तर श्रीकृष्ण के चरणों का आघात हुआ तो उसे बोध हो आया और उसने स्वीकार किया, "हे नाथ ! मैंने आपका कितना अपराध किया, परन्तु फिर भी हे दयामय ! आपने कृपापूर्वक अपने चरणचिह्न को मेरे मस्तक पर अंकित कर दिया है।" यह भी श्रीकृष्ण के चरणारविन्द के आश्रित का ही उद्गार है। 'अपराधभंजन' में एक शुद्धभक्त कहता है, "हे नाथ ! मुझे यह कहते हुए लज्जा का अनुभव होता है कि आज तक मैंने काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मात्सर्य रूपी स्वामियों का आज्ञापालन किया है। कभी-कभी तो ऐसा करने में मुझे बिल्कुल निकृष्ट आचरण तक करना पड़ा है। मैंने उनकी सेवा बड़े ही निश्छलभाव सेकी है। निरन्तर उनका आज्ञापालन किया है। परन्तु फिर भी वे तृप्त नहीं हुए और न ही मुझे अपनी सेवा से मुक्त करते । इस प्रकार मुझसे सेवा कराने में उन्हें लज्जा भी नहीं आती । परन्तु हे यदुनाथ ! अब मुझे समझ आ गई है और इसलिये अब मैं उनको छोड़कर अभय प्रदान करने वाले आपकी शरण में आया हूँ। इसलिये मुझे अपनी सेवा में नियुक्त कीजिये।" यह शरणागत होकर श्रीकृष्ण के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने का उदाहरण है। वैदिक शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब शुष्क ज्ञान के द्वारा