भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रीतिभक्तिरस [ २५३ धारण किये हुए हैं और उनकी रत्नराशि देदीप्यमान है। गरुड़ पर विराजमान अपनी शाश्वत् अवस्था में वे बड़े ही भव्य लगते हैं। परन्तु अब वही भगवान् विष्णु इस समय कंस के शत्रु हैं और उनके इस निज रूप ने मुझे वैकुण्ठ के सारे ऐश्वर्यों को भुला दिया है।” एक दूसरे भक्त ने कहा है- “हे भगवन् ! जिनके रोमकूपों से निरन्तर करोड़ों ब्रह्माण्डों का नित्य उदय होता रहता है, जो कृपा के सागर हैं, अचिन्त्य शक्तिशाली हैं, सर्वसिद्धिमय सब अवतारों के बीज वही श्रीभगवान् परम ईश्वर, परम आराध्य, परम सर्वज्ञ, दृढ़ व्रत वाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से पूर्ण, क्षमा के सागर तथा शरणागत जीवों के रक्षक हैं। वे उदार, सत्यप्रतिज्ञ, दक्ष, मंगलमय, बलशाली, शास्त्रों के अनुगामी, भक्तों के मित्र, वदान्य, तेजोमय, युक्त, कृतज्ञ, कीर्ति के आश्रय, मान्य, धर्मात्मा, सम्पूर्ण बल के निधान तथा प्रेम के वश में होने वाले हैं। अपनी ओर दास्यभाव से आकृष्ट भक्तों के एकमात्र वही आश्रय हैं।” भगवान् के दास चार प्रकार के होते हैं- अधिकृत (जैसे ब्रह्मा, शिव आदि, जो रजोगुण और तमोगुण पर नियंत्रण के लिये नियुक्त किये गये हैं), आश्रित भक्त, नित्यपार्षद तथा वे भक्त जो निरन्तर केवल भगवान् ही के अनुगामी हैं। अधिकृत सेवक श्रीकृष्ण की अर्द्धांगिनी जाम्बवती और कालिन्दी के बीच परस्पर वार्ता हो रही थी। जाम्बवती ने पूछा, “यह कौन हमारे श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा कर रही है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “यह अम्बिका है। अम्बिका अर्थात् पार्वती, जिसके हाथ में सारे ब्रह्माण्ड की व्यवस्था है।” फिर जाम्बवती ने पूछा, “यह कौन है जो श्रीकृष्ण को देखकर काँप रहा है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “ये भगवान् शिव हैं।” फिर जाम्बवती बोली, “यह कौन प्रार्थना कर रहा है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “ये ब्रह्मा हैं।” जाम्बवती बोली, “फिर कौन है जो भूमि पर गिर कर श्रीकृष्ण को दण्डवत् करता है?” कालिन्दी ने उत्तर दिया, “देवराज इन्द्र।”