भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ । भक्तिरसामृतसिन्धु नेत्र कमलदल के समान प्रफुल्ल हैं। वे देवताओं की शक्ति को भी निरस्त कर सकते हैं। विशेष रूप से अमूल्य रत्नों से विभूषित रहते हैं।" जब श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ में थे तो किसी ने उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया— "हे नाथ ! उद्धव आदि आपके निजपार्षद द्वारका के द्वार पर खड़े निरन्तर आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा करते रहते हैं। उनके नेत्र प्रायः अश्रुधारा से पूर्ण रहते हैं। अपने सेवाभाव के उत्साह में वे शिवजी की प्रलयाग्नि से भी नहीं डरते। वे पूर्ण रूप से आपके चरणकमलों के शरणागत हैं देव !" श्रीकृष्ण के बहुत-बहुत से अन्तरंग पार्षदों में से उद्धव को सर्वोत्तम माना जाता है। उनका विवरण इस प्रकार है—उनके शरीर का वर्ण ठीक कालिन्दी के रंग जैसा है और उसी के समान शीतल है। वे निरन्तर श्रीकृष्ण द्वारा पहनी माला को धारण किये रहते हैं। उनके वस्त्र भी श्रीकृष्ण के समान ही पीतवर्ण हैं। उनके भुजदण्ड अर्गला के समान लम्बे और स्थूल हैं तथा नेत्र ठीक कमलदल जैसे हैं। ऐसे भक्तों और पार्षदों में सर्वप्रधान उद्धवजी के चरणकमलों में हम सादर प्रणाम करते हैं।" उद्धव ने भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों का वर्णन इस प्रकार किया है—"भगवान् श्रीकृष्ण, जो हमारे स्वामी और आराध्य देव हैं, ब्रह्मा, शिव और सम्पूर्ण जगत् के नियन्ता हैं। वे अपने पितामह उग्रसेन से आदेश ग्रहण करते हैं। वे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के स्वामी हैं; परन्तु फिर भी उन्होंने सागर से थोड़ी भूमि माँगी। विद्या के सागर होते हुए भी वे मुझे तुच्छ से कभी-कभी परामर्श लेते हैं। वे इतने महान् और वदान्य हैं; फिर भी अपनी नाना क्रियाओं में साधारण मनुष्य के समान संलग्न हैं।" भगवान् के अनुगामी (अनुग) .. जो निरन्तर भगवान् की निज सेवा में लगे रहते हैं, उन्हें अनुग कहा जाता है। इसके उदाहरण सुचन्द्र, मण्डल, स्तम्ब, सुतम्ब आदि हैं। ये सब द्वारकानिवासी हैं और अन्य पार्षदों के समान ही वस्त्रालंकरों से सुशोभित हैं। अनुग भिन्न-भिन्न प्रकार की विशिष्ट सेवाओं में नियुक्त रहते हैं। मण्डन सदा श्रीकृष्ण के सिर पर छत्र धारण किये रहता है। सुचन्द्र चँवर डुलाता है, और सुतम्ब ताम्बूल अर्पण किया करता है। ये सभी महाभागवत हैं और निरन्तर भगवान् की प्रेममयी दिव्य सेवा में संलग्न रहते हैं। जैसे द्वारका में अनुग हैं, वैसे ही वृन्दावन में भी अनेक अनुग हैं।