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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 380 में से

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पृष्ठ 284

प्रीतिभक्तिरस [ २५७ इनके नाम इस प्रकार हैं—रक्तक, पत्रक, पत्री, मधुकण्ठ, मधुव्रत, रसाल, सुविलास, प्रेमकन्द, मरन्दक, आनन्द, चन्द्रहास, पयोद, बकुल, रसद तथा शारद। वृन्दावन के अनुगों के रूप का वर्णन इस प्रकार है—"हम नन्द- नन्दन के नित्य अनुगों की सादर वन्दना करते हैं। वे निरन्तर वृन्दावन में वास करते हैं और उनके शरीर रत्नों के हार और कंचन किंकिणियों से सुशोभित हैं। वे भ्रमर और स्वर्णिम चन्द्र की सी कान्ति से युक्त हैं और उनके परिधान अपने-अपने विशेष रंग रूप के अनुरूप हैं।" उनकी विशेष-विशेष सेवाओं को यशोदा मैय्या के इस वाक्य से समझा जा सकता है—'बकुल ! श्रीकृष्ण के पीताम्बर का परिमार्जन करो। वारिद तुम उनके स्नान जल को अगुरु से सुगन्धित करो। रसाल को ताम्बूल तैयार करना है। तुम सब देख सकते हो कि श्रीकृष्ण आ रहे हैं। चारों ओर धूल छा गई है और दूर से गाय भी दृष्टिगोचर होती हैं।'" सारे अनुगों में रक्तक को प्रधान माना जाता है। उसके रूप का वर्णन इस प्रकार है—"सुन्दर पीताम्बर को धारण किये हुए, अपने अंगों की श्यामल कान्ति से दुरुवादल की कान्ति को लज्जित करने वाले, राग- विद्या में निपुण कंठ से युक्त तथा गोकुल के युवराज कृष्ण की अच्छी प्रकार से सेवा करने वाले रक्तक नामक प्रधान अनुचर का मैं अनुगमन करता हूँ।" रक्तक का श्रीकृष्ण में कसा अनुराग था, इसका एक उदाहरण रसद से उसके वाक्य द्वारा समझा जा सकता है, "हे मित्र सुनो ! मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मैं निरन्तर गिरिवरधारी व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण की सेवा में संलग्न रह सकूँ।" श्रीकृष्ण की निज सेवा के परायण भक्त निरन्तर बड़े सावधान रहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि भगवान् का निजी सेवक बन जाना कोई साधारण बात नहीं है। श्रीकृष्ण की सेवा में लगी हुई चींटी को भी प्रणाम करने वाला शाश्वत् सुख को प्राप्त हो जाता है। फिर उसका क्या कहना है जो साक्षात् श्रीकृष्ण की सेवा के परायण हो। रक्तक ने एक बार अपने अन्तर में कहा था, “जिस प्रकार श्रीकृष्ण मेरे आराध्य और देव हैं उसी प्रकार उनकी ये सखी गोपांगनाएँ भी मेरे लिये सेव्य और आराध्य हैं। गोपियाँ ही क्यों, जो कोई भी मेरे प्रभु की सेवा में संलग्न हो वह भी मेरे लिये आराध्य होगा। मैं जानता हूँ कि मुझे सावधानीपूर्वक इस अभिमान से बचना चाहिये कि मैं भगवान् के सेवकों और दासों में से एक हूँ।" इस वाक्य से समझा जा सकता है कि शुद्धभक्त, जो वास्तव में भगवान् की