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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 293

अध्याय ३८ निर्वेद तथा वियोग महाभागवत उद्धव ने एक बार श्रीकृष्ण को यह पत्र लिखा-“हे कृष्ण ! मैंने अभी-अभी नाना प्रकार के दर्शन-ग्रन्थों और, वैदिक श्रुतियों का अध्ययन समाप्त किया है, जो जीवन के लक्ष्य का वर्णन करते हैं। अपने इस अध्ययन से मुझे प्रसिद्धि भी मिली है; परन्तु फिर भी मेरे इस ज्ञान को धिक्कार है क्योंकि यद्यपि मैं वैदिक ज्ञान की ज्योति का ओस्वादन कर रहा हूँ परन्तु आपके चरण नखांकुर से प्रस्फुटित द्युति का रसास्वादन नहीं कर पाया। अतएव मेरा यह अभिमान और वैदिक ज्ञान जितनी शीघ्र समाप्त हो जाये, अच्छा है।” यह निर्वेद का उदाहरण है। एक अन्य भक्त ने बड़ी आतुरता से अपने भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है—“हे नाथ ! मेरा मन बड़ा अस्थिर है। इसलिये इसे मैं आपके चरणकमलों में एकाग्र करने में सफल नहीं हो पा रहा हूँ। अपनी इस अयोग्यता के कारण मुझे लज्जा आती है और सारी रात अपनी इस अयोग्यता पर शोक करते हुए मैं सो नहीं पाता।” यह चिन्ता है। ‘कृष्णकर्णामृत’ में विल्वमंगल ठाकुर ने अपनी चपलता इस प्रकार व्यक्त की है—“हे नाथ ! तुम्हारी शैशवकालीन चपलता त्रिभुवन में सबसे अद्भुत है। अब तुम स्वयं इसे जानते हो इसलिये मेरे मन की चंचलता को भी सहज समझ सकते हो। इसे केवल तुम जानते हो अथवा मैं। मैं तो बस यह जानने को उत्सुक हूँ कि किस प्रकार तुम्हारे चरणकमलों में मेरा मन एकाग्र हो सकता है।” एक अन्य भक्त अपने को उद्धत बताकर कहता है, “हे नाथ ! अपनी शूद्रता पर विचार किये बिना मैं आपके सामने स्वीकार करता हूँ कि मेरे नेत्र श्याम भ्रमरों के समान आपके चरणकमलों पर मंडराना चाहते हैं।” श्रीमद्भागवत (७.४.३७) में देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर को महाभागवत् प्रह्लाद महाराज की गाथा सुना रहे थे। प्रह्लादजी की