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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 380 में से

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श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६५ है ?" भाव यह है कि अक्रूर को अनुभव हुआ कि नेत्रों की कृतार्थता श्रीकृष्ण के दर्शनों में ही है। अतएव जिस समय श्रीकृष्ण पृथ्वी पर साक्षात् दृश्यमान थे तो जिस किसी ने उन्हें देखा उसने नेत्रों की पूर्णता को प्राप्त कर लिया । बिल्वमंगल ठाकुर के 'कृष्णकर्णामृत' में प्रेम में उत्सुकता का यह उदाहरण—"कैसा दुर्भाग्य है ! हे हरे ! हे दीनबन्धु ! हे प्रिय कृष्ण ! तुम्हें देखे बिना इन अधन्य दिनों को मैं कैसे व्यतीत करूँ ? हाय कैसे व्यतीत करूँ ?" इसी प्रकार की भावना उद्धव ने श्रीकृष्ण को लिखे अपने एक पत्र में व्यक्त की है, "हे व्रजराज ! आप नेत्रों के लिये अमृतसिन्धु हैं । आपके चरणकमलों और अंगकांति को देखे बिना मुझे किसी भी प्रकार, किसी भी अवस्था में शान्ति नहीं मिलती । चित्त निरन्तर दुःख-सागर में मग्न रहता है । आपके विरह का एक-एक क्षण मेरे लिये युगों के समान हो गया है।" 'कृष्णकर्णामृत' में ही कहा है—"हे नाथ ! आप कृपा के सागर हैं । अत्यन्त दीनता के साथ बद्धाञ्जलि होकर मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ । क्या आप कृपया अपने कृपाकटाक्ष रूपी शीतल जल से मेरा सिंचन करेंगे ? इससे मुझे बड़ा सन्तोष होगा।" श्रीकृष्ण के एक भक्त ने कहा, "जब शशिशेखर शिव तक आपको नहीं देख सकते, फिर मुझ कीट से अधम के लिये क्या कहना । हे नाथ मैंने केवल पाप ही पाप किये हैं। मैं जानता हूँ कि मैं आपसे प्रार्थना करने के योग्य नहीं । परन्तु आपका एक नाम दीनबन्धु है । इसलिये आपसे प्रार्थना है कि कृपया अपने दिव्य कृपाकटाक्ष की किरण से अभिषिक्त करके मुझे शुद्ध कर दें । मेरी रक्षा तभी हो सकती है जब मैं पूर्ण रूप से आपके कृपाकटाक्ष में स्नान कर लूँ । अतएव हे नाथ ! कृपा करें।"