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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 380 में से

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पृष्ठ 294

निर्वेद तथा वियोग [ २६७ स्वाभाविक भक्ति का प्रमाण इस बात से मिल जाता है कि जब वे नन्हें बालक थे तब भी उन्हें अपने सखाओं के साथ खेलना अच्छा नहीं लगता था। इसके स्थान पर वे सदा भगवान् की कीर्ति का प्रचार किया करते थे। अपने साथियों के खेलों में भाग लेने के स्थान पर वे जड़वत् समाधि में मग्न रहते, क्योंकि उनका ध्यान सदा श्रीकृष्ण पर था। अत- एव बाह्य जगत् उन्हें स्पर्श भी न कर सका। एक ब्राह्मण भक्त के सम्बन्ध में प्रसिद्ध उल्लेख है, "यह ब्राह्मण कर्मकाण्ड में बड़ा कुशल है पर न जाने क्यों यह अपलक नेत्र और निस्पंद देह को धारण किये हुए चित्रलिखित सा खड़ा है। लगता है उस विदग्ध वेणुवादन में रत कृष्ण की दिव्य माधुरी ने इसके मन को मोहित कर लिया है और उसके प्रति अनुरक्त होकर इसने अपनी दृष्टि को सामने घनश्याम मेघ पर लगा रखा है, जिससे इसे निरन्तर श्रीकृष्ण के विग्रह वर्ण का स्मरण हो रहा है।" यह प्रेमभाव में भक्त को होने वाली जड़ता का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (७.४.४०) में प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि अपने शैशव काल में भी जब वे भगवान् की कीर्ति का गायन करते तो निर्लज्ज पागल के समान नाच उठते। भगवान् की लीला के चिन्तन में पूर्ण रूप से निमग्न हो जाने के कारण कभी-कभी इन लीलाओं का अनुकरण भी करने लगते। यह भक्त के उन्माद का उदाहरण है। इसी प्रकार कहा जाता है कि देवर्षि नारद का श्रीकृष्ण में ऐसा भावोन्मत्त प्रेम था कि वे कभी-कभी नंगे नाचने लगते; कभी उनका पूर्ण शरीर स्तम्भित हो जाता; कभी वे जोर-जोर से हँसते और कभी उच्च स्वर से रुदन करने लगते; कभी वे एक दम चुप पड़ जाते और कभी व्याधिग्रस्त लगते, यद्यपि उन्हें कोई रोग नहीं था। यह भी भक्तिभाव में होने वाले उन्माद का उदाहरण है। 'हरिभक्तिसुधोदय' में उल्लेख है कि जब महाराज प्रह्लाद अपने को भगवान् के समीप जाने के अयोग्य समझ रहे थे तो वे दुःख के सागर में निमग्न हो गये और इस प्रकार आँसू बहाते हुए भूमि पर गिर पड़े और अचेतन हो गये। एक महान् भक्त के शिष्यों ने एक बार आपस में इसप्रकार कहा—'हे भाइयों ! हमारे गुरु महाराज श्रीकृष्ण के चरणकमलों को देखकर शोक की अग्नि में कूद पड़े हैं और इस अग्नि के कारण उनका चेतना रूपी जल बिल्कुल सूख गया है। अतः आओ उनके कर्णों में भगवन्नामामृत का प्रवेश करायें, जिससे उनके प्राणरूपी हंस फिर चेष्टा करने लगें।"

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