भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८] भक्तिरसामृतसिन्धु जब भगवान् श्रीकृष्ण शोणितपुर नगर में बलिपुत्र बाण से लड़ने गये और उन्होंने उसके हाथ काट डाले तो श्रीकृष्ण के विरह में उनके युद्ध का चिन्तन करते हुए उद्धव पूर्ण रूप से स्तम्भित होकर अचेतन हो गया । जब कोई भक्त पूर्ण रूप से भगवत्प्रेम को प्राप्त हो जाता है तो भगवान् के विरह में उसमें ये भाव प्रकट हो सकते हैं—अंगों में संताप, कृशता, निद्रानाश, अनासक्ति, जड़ता, व्याधि, उन्माद, मूर्च्छा तथा मरण । अंगों में संताप का उदाहरण इस प्रकार है—उद्धव ने एक समय नारद से कहा "हे महर्षि ! कमल हमें संताप दे तो कोई बात नहीं, क्योंकि वह सूर्य का मित्र है; बड़वानल सागर भी हमारे लिये कष्टदायक हो सकता है तथा दैत्य का मित्र इन्दीवर भी हमें नाना प्रकार से कष्ट दे तो हमें दुःख न होगा; परन्तु सबसे बड़ा दुःख तो इस बात का है कि ये सब हमें श्रीकृष्ण का स्मरण कराकर बहुत अधिक दुःख के सागर में पहुँचा देते हैं।" यह श्रीकृष्ण के विरह में होने वाले संताप का उदाहरण है। श्रीकृष्ण के दर्शन के लिये द्वारका गये परन्तु द्वार पर ही रोके गये कुछ भक्त कहने लगे, 'हे कृष्ण ! हे पाण्डवों के बान्धव ! जैसे हँस जल में कमलों के बीच रहना चाहता है और जल से निकाल दिये जाने पर मर जाता है, उसी प्रकार हमारी एकमात्र इच्छा तुम्हारे साथ रहने की है। तुम्हारे वियोग में हमारे बाहु तक कृश और विवर्ण हो चले हैं।" राजा बहुलाश्व अपने महल में बड़े सुखपूर्वक विराजमान थे । परन्तु श्रीकृष्ण के विरह में उनके लिये रात्रि बहुत लम्बी और दुःखामक हो गई । राजा युधिष्ठिर ने एक बार कहा था, "हे कृष्ण ! हे पार्थसारथि ! अर्जुन के सारथि कृष्ण ही त्रिभुवन में मेरे एकमात्र बान्धव हैं, सम्बन्धी हैं। उनके चरणकमलों के विच्छेद में मेरा मन दिनरात उन्मत्त हो चला है। मैं नहीं जानता कि अपने को कहाँ टिकाऊँ अथवा मन की स्थिरता के लिये कहाँ जाऊँ।" यह आलम्बनशून्यता तथा अनासक्ति का भाव है। श्रीकृष्ण के कुछ गोप-सखा कहने लगे, "हे कृष्ण ! हे मुरारि ! तनिक अपने निजी सेवक रक्तक का तो विचार करो । इसने एक मोरपंख क्या देख लिया कि आँखें बन्द कर ली हैं और अब घास चरती हुई गायों की ओर भी ध्यान नहीं दे रहा, वरन् उन्हें चारण करते हुए दूर छोड़