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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

शान्तरस [ २४६ लिये गये तो उन्हें प्रणाम करने के लिये झुकने पर भगवान् के चरणकमल के जल से मिश्रित तुलसी की सुगन्ध ने उनकी नासिका में प्रवेश किया और तुरन्त उनके चित को आकृष्ट कर लिया। यद्यपि ये चारों संत पुरुष निरन्तर निर्विशेष ब्रह्म में लीन रहते थे; परन्तु भगवान् के संग से और तुलसी को सूँघने से उनके शरीर में तुरन्त रोमांच हो आया। यह सिद्ध करता है कि ब्रह्म साक्षात्कार को प्राप्त पुरुष भी यदि शुद्धभक्ति परायण भक्तों का संग करे तो वह भी अविलम्ब भगवान् के सविशेष साकार रूप की ओर आकृष्ट हो जायगा। भक्तियोग के शान्तरस में सिद्ध महर्षियों के लक्षण अर्थात् अनुभाव इस प्रकार हैं—वे अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग में स्थिर रखते हैं और अवधूतों के समान चेष्टा करते हैं। अवधूत उस उच्च कोटि के योगी को कहा जाता है जो किसी सामाजिक, धार्मिक अथवा वैदिक परिपाटी को नहीं मानता। वे देख-देख कर चलते हैं; बोलते हैं तो ज्ञानमुद्रा का प्रदर्शन करते हैं, अर्थात् तर्जनी और अंगूठे को जोड़े रहते हैं। वे नास्तिकों से द्वेष नहीं करते और न ही भक्तों में अधिक रुचि रखते हैं। ऐसे पुरुषों के लिए मुक्ति और विषयपरायण जीवन से अनासक्ति का बहुत महत्त्व है। वे निरन्तर उदासीन बने रहते हैं और उनमें ममता और अहंमता का अभाव रहता है। वे बहुत गम्भीर और मौन रहते हैं; परन्तु उनके विचार पूर्ण रूप से भगवान् पर केन्द्रित रहते हैं। इन असाधारण अनुभावों का विकास शान्तरस में स्थित भक्तों में होता है। नासिका के अग्रभाग में दृष्टि को केन्द्रित करने के सम्बन्ध में 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में एक भक्त का कथन है। 'किसी योगी को ऐसा करते देखकर वह बोला, "यह योगी अपनी दृष्टि को नासाग्र में एकाग्र कर रहा है। इससे प्रतीत होता है कि इसे अपने अन्तर में भगवान् के शाश्वत् रूप का साक्षात्कार हो चुका है।' कभी-कभी शान्तरस में भक्त जँहाई लेता है, अंगड़ाई लेता है, किसी को उपदेश करता है, भगवान् के स्वरूप को प्रणाम करता है, प्रार्थना करता है और अपने शरीर से प्रत्यक्ष रूप से उनकी सेवा करना चाहता है। ये शान्तरस में स्थिर भक्तों के कुछ साधारण लक्षण हैं। किसी भक्त को जँहाई लेते देखकर अन्य भक्त कहने लगा, 'हे योगी ! लगता है तुम्हारे हृदय में कुछ भक्तिरस अवश्य है जिस कारण तुम जँहाई ले रहे हो।" शान्तरस में कभी-कभी पाया जाता है कि भक्त भूमि पर लोटने लगता है, उसे रोमांच हो उठता है और सम्पूर्ण शरीर कांपने