भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु लगता है। इस प्रकार प्रेमसमाधि के विभिन्न लक्षण इन भक्तों में स्वतः प्रकाशित हो जाते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में उल्लेख है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण अपने पाञ्चजन्य शंख का वादन कर रहे थे तो कन्दरावासी महर्षियों ने तुरन्त प्रतिक्रिया की। इससे उनकी समाधि खुल गई थीं। उन्होंने देखा कि उनके शरीर में रोमांच हो आया है। कभी-कभी शान्तरस में भक्तगण निर्वेद, शान्ति, हर्ष, मति, स्मृति, विषाद, हर्ष, आवेग और वितर्क आदि संचारि- भावों को अभिव्यक्त करते हैं। एक आत्मज्ञानी विषाद से तुरन्त कम्पित हो उठा। वह सोच रहा था कि उसके समय का अपव्यय हो रहा है। भाव यह है कि ऋषि को शोक हुआ कि भगवान् द्वारका में स्वयं विराजमान हैं, परन्तु फिर भी ध्यान में मग्न होने के कारण वह उनके दर्शनों से वंचित है। जब कोई योगी सब प्रकार के मनोधर्मों से मुक्त होकर ब्रह्मभूत हो जाता है तो उसकी अवस्था को देहात्मबुद्धि से परे समाधि कहा जाता है। उस अवस्था में जब वह भगवान् की दिव्य लीला कथा को सुनता है तो देह पुलकित हो उठती है। ब्रह्म-साक्षात्कार के द्वारा निर्विकल्प समाधि की अवस्था को पहुँचा भक्त जब भगवान् श्रीकृष्ण के शाश्वत् स्वरूप के संस्पर्श में आता है तो उसका दिव्य आनन्द अनन्त गुणा बढ़ जाता है। एक महर्षि ने किसी दूसरे से जिज्ञासा की थी, "हे सखे ! क्या तुम समझते हो कि जब मेरे अष्टांगयोग की सिद्धि हो जायेगी तो मैं भगवान् के शाश्वत् रूप को देख सकूँगा ?" यह शान्तरस में स्थित भक्त की जिज्ञासा का उदाहरण है। सूर्यग्रहण के अवसर पर जब भगवान् श्रीकृष्ण अपने अग्रज बलराम और बहन सुभद्रा को साथ लेकर रथ पर सवार होकर कुरुक्षेत्र पधारे तो बहुत से ध्यानयोगी भी वहाँ आये। जब इन योगियों ने भगवान् कृष्ण- बलराम को देखा तो वे कह उठे कि अब जबकि उन्होंने भगवान् की अनु- पम विग्रह ज्योति को देख लिया है, वे निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार से मिलने वाले दिव्य सुखको भुला बैठे हैं। इस सन्दर्भ में ही एक योगी ने श्रीकृष्ण के पास जाकर कहा, "हे प्रभो ! आप सब दिव्य अवस्थाओं से परे अप्राकृत आनन्द से परिपूर्ण हैं। अतएव दूर से आपको देख लेने मात्र से ही मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच गया हूँ कि मेरे लिये निर्विशेष ब्रह्म के आनन्द में स्थित होने की कोई आवश्यकता नहीं है।" जब एक महान् योगी को श्रीकृष्ण के पाञ्चजन्य शंख की ध्वनि ने