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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

शान्तरस [ २५१ ध्यानसमाधि से जगा दिया तो वह अविभूत हो उठा, इतना अधिक कि वास्तव में अपने सिर को भूमि पर बजाने लगा । उसकी आँखें प्रेमभाव के अश्रुओँ से भर आईं और वह अपने योग-अभ्यास के सारे विधि-विधान का उल्लंघन कर बैठा । इस प्रकार उसने ब्रह्म-साक्षात्कार की पद्धति की एकदम उपेक्षा कर दी । बिल्वमंगलठाकुर अपने ग्रन्थ 'कृष्णकर्णामृत' में कहते हैं—'निर्वि- शेषवादी चाहें तो निर्विशेष ब्रह्म को भजते रहें। यद्यपि मैं पहले ब्रह्म- साक्षात्कार के पथ पर दीक्षित हुआ था । पर अब एक नटखट बालक द्वारा मार्गभ्रष्ट हो चुका हूँ, जो बहुत चंचल है और गोपियों में अत्यासक्त है। अब उसी ने मुझे अपना दास बना लिया है। ऐसे में मुझे ब्रह्मसाक्षात्कार के पथ का विस्मरण हो गया है।" बिल्वमंगल ठाकुर पहले परतत्त्व के ब्रह्मसाक्षात्कार में दीक्षित थे। परन्तु बाद में वृन्दावन में श्रीकृष्ण का संग करके वे कुशल भक्त बन गये । यही शुकदेव गोस्वामी के साथ हुआ । वे भी भगवान् की कृपा से निर्विशेष ब्रह्म के पथ को छोड़कर भक्तिमार्ग में आ गये । शुकदेव गोस्वामी और बिल्वमंगल ठाकुर, ये दोनों ही परतत्त्व के निर्विशेष स्वरूप को छोड़ कर भक्तिमार्ग में आये थे। अतएव ये शान्तरस में स्थित भक्तों के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। कुछ अधिकारियों के अनुसार इस अवस्था को रसों के अन्तर्गत नहीं माना जा सकता । परन्तु श्रील रूपगोस्वामी कहते हैं कि चाहे कोई इसे रस न भी माने; परन्तु यह तो मानना ही होगा कि इससे भक्तियोग का प्रारम्भ होता है। परन्तु यदि कोई इसके आगे भगवान् की वास्तविक सेवा की ओर नहीं बढ़ता तो उसे रस के स्तर पर नहीं समझा जा सकता । इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव को स्वयं यह उपदेश दिया है, "स्थिर अवस्था में मेरे निज रूप में निष्ठा होती है। उसका नाम शान्तरस है।" इस अवस्था में स्थिति के बिना कोई भी शुद्ध भक्तियोग नहीं कर सकता । भाव यह है कि कम से कम शान्तरस में स्थित हुए बिना कोई भी भगवान् के निज रूप में निष्ठ नहीं हो सकता ।