भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३७ श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा की प्राप्ति, उनके चरणकमल की रज की प्राप्ति, उनका प्रसाद, तथा उनके भक्तों का संग—ये वे कुछ उद्दीपन हैं जिनसे भक्त भगवान् की प्रेममयी सेवा में संलग्न होता है । भीष्म पितामह के देहत्याग के अवसर पर उपस्थित होकर श्रीकृष्ण ने अपनी अहैतुकी कृपा का परिचय दिया था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में पौत्र अर्जुन से हारकर भीष्मदेव शरशय्या पर विराज रहे थे । प्राकृत-जगत् से उनके प्रस्थान का समय निकट था। जब भगवान् श्रीकृष्ण, महाराज युधिष्ठिर तथा अन्य पाण्डव भीष्मदेव के निकट पहुँचे तो वे भगवान् श्रीकृष्ण से बड़े अनुगृहीत हुए और कृपाचार्य से कह उठे, “हे कृपाचार्य जी ! भगवान् श्रीकृष्ण की अद्भुत अहैतुकी कृपा का अवलोकन कीजिये । मैं परम अभागा हूँ, मुझमें कोई योग्यता नहीं। युद्ध में मैं श्रीकृष्ण के परम अंतरंग सखा अर्जुन का विरोध कर रहा था, यहाँ तक कि मैंने उसे मारने की भी पूरी चेष्टा की। मुझमें इतने अवगुण हैं, परन्तु भगवान् फिर भी इतने दयामय हैं कि वे जीवन के इस अन्तिम क्षण में मुझे मिलने आये हैं। वे सम्पूर्ण महर्षिवृन्द के आराध्य हैं। परन्तु फिर भी करुणावश मुझ जैसे अधम को दर्शन देने पधारे हैं।” कभी-कभी श्रीकृष्ण की वंशी और श्रृंग की ध्वनि, उनकी हँसी, भूमि पर उनके चरणचिह्नों के अंक, उनकी दिव्य सौरभ और उनके वर्ण के समान आकाश में नवोदित मेघ—ये सब भी कृष्णप्रेम के उद्दीपन का काम करते हैं। 'विदग्धमाधव' में उल्लेख है—श्रीकृष्ण को वेणु बजाते देखकर बल- देव ने बड़ी आतुरता से कहा, "देखो देखो, श्रीकृष्ण के दिव्य वेणुरव को सुनकर देवराज इन्द्र अपने स्वर्ग में रोने लगा। भूमि पर उसकी अश्रुधारा के गिरने से वृन्दावन देवताओं का दिव्य निवास लग रहा है।”