भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६१ कृष्णप्रेम में होने वाले अनुभाव इस प्रकार हैं—पूर्ण रूप से भगवान् की सेवा के परायण हो जाना; निष्ठा और श्रद्धापूर्वक उनकी आज्ञापालन में लगे रहना, पूर्ण रूप से प्रेममयी भगवत्सेवा में तत्पर होकर उद्वेग और ईर्ष्या से मुक्त हो जाना तथा श्रद्धा प्रेमसहित भगवान् की सेवा करने वाले भक्तों से मैत्री करना। ये सब लक्षण प्रेम के अनुभाव हैं। प्रेम के पहले लक्षण अर्थात् किसी विशेष सेवा में तत्पर रहने का प्रतीक दारुक है। यह श्रीकृष्ण का सेवक है और निरन्तर उन्हें चँवर डुलाया करता है। इस प्रकार सेवा करते-करते वह प्रेमभाव से ओत-प्रोत हो गया और प्रेम के लक्षण उसके शरीर पर प्रकट हो गये। परन्तु दारुक की अपनी सेवा में ऐसी निष्ठा थी कि उसने प्रेम की सब अभिव्यक्तियों को रोक लिया क्योंकि उसके विचार में इनसे उसके सेवा कार्य में बाधा पड़ रही थी। ये सब लक्षण अपने आप उदित हुए थे; परन्तु उसने इन्हें कुछ भी महत्त्व नहीं दिया। श्रीमद्भागवत (१०.८६.३८) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को अपने घर आया देख श्रुतदेव ब्राह्मण इतना आनन्दविह्वल हो उठा कि श्रीकृष्ण के चरणकमलों में प्रणाम करके हाथ उठा-उठाकर नाचने लगा। भगवान् श्रीकृष्ण का एक भक्त उन्हें सम्बोधित करते हुए कहने लगा, “हे नाथ ! यद्यपि आप वृत्तिक नाचने वाले नहीं हैं; परन्तु आपके नृत्य ने हमें इतना आश्चर्यचकित कर दिया है कि लगता है कि आप स्वयं अखिल नृत्यकला के गुरु हैं। निःसन्देह आप ने साक्षात् प्रेम की देवी से नाचना सीखा होगा।” जब कोई भक्त प्रेमभाव में भरकर नाचता है तो सात्त्विक भावों का उदय होता है। इन भावों को सात्त्विक कहने का तात्पर्य यह है कि वे शुद्ध सत्त्व के स्तर पर प्रकट होते हैं। ये प्राकृत भावना के लक्षण नहीं हैं, ये तो साक्षात् आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। श्रीमद्भागवत (१०.८५.३८) में शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं कि वामनदेव के चरणकमलों में अपना सर्वस्व अर्पण करके बलि महाराज ने तुरन्त उनके चरणों को पकड़ लिया और पकड़ कर अपने हृदय से लगा लिया। आनन्द विह्वल होने के कारण उनमें प्रेम के सारे दिव्य लक्षणों का उदय हुआ। उनकी वाणी कम्पित हो उठी और नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। प्रेमभाव की ऐसी अभिव्यक्तियों में अनेक गौण लक्षण भी होते हैं—जैसे हर्ष, गर्व, धृति, निर्वेद, विषण्णता, दैन्य, चिन्ता, स्मृति, शंका, मति, उत्सुकता, चपलता, वितर्क, आवेग, लज्जा, जाड्य, मोह, उन्माद,