भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३२ स्थायिभाव के लक्षण जो भाव प्रेम की सब क्षणिक अभिव्यक्तियों को और प्रेम के विरुद्ध भावों को दबा कर निरन्तर शक्तिशाली राजा के समान विराजित होता है, वह स्थायिभाव कहलाता है। यह भाव मुख्य और गौण दोनों प्रकार से अभिव्यक्त हो सकता है। इसलिए कृष्णविषया रति को मुख्या और गौण, ऐसा दो प्रकार का कहा गया है। शुद्धसत्त्व में स्थिर हो जाने पर ही इस कृष्णरति के भावों का उदय हो सकता है। मुख्यारति के भी दो भेद हैं—स्वार्था और परार्था । जब भाव के अविरुद्ध लक्षण स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होते हैं तो किसी विरुद्ध भाव की अभिव्यक्ति से ग्लानि होती है। ऐसी रति को स्वार्था कहते हैं। जिस रति में अविरुद्ध और विरुद्ध भावों का परस्पर सामंजस्य हो सकता है, उसे मुख्या परार्था रति कहते हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, और माधुर्य—इस प्रकार ये मुख्या परार्था रति के पाँच भेद हैं। यह रति प्रेम के पात्रों के वैशिष्ट्य के अनुसार अनेक भेदों को प्राप्त होती है। शान्त शुद्धा रति के सामान्या, स्वच्छा, और शान्त—ये तीन विभेद हैं। किसी विशेषता को प्राप्त हुये बिना सामान्य व्यक्तियों अथवा बालकादि द्वारा अभिव्यक्त रति सामान्या है। यह कदाचित् अंगों के कंपन और नेत्रों की विवर्णता अर्थात् नेत्रों का लाल हो जाना, सफेद हो जाना इत्यादि लक्षणों के रूप में प्रकट होती है। इस रति का कोई विशेष लक्षण नहीं है। कोई नवयुवक किसी वृद्ध से कह रहा है—'हे वृद्ध देखो ! यह तीन वर्ष की बालिका भी सामने खड़े श्रीकृष्ण को देखकर आनन्द में भरकर हुंकार करती हुई उनके पास पहुँचने के लिए आगे की ओर दौड़ रही है। देखो