भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 262, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थायिभाव के लक्षण [ २३५ तो।" यह बालिका के हृदय में सामान्या रति का उदाहरण है जिसके अपने कोई विशेष लक्षण नहीं होते। श्रीकृष्ण के प्रति नाना प्रकार की रति के अनुसार भक्तों के अनेक भेद हैं। उनके लक्षण रत्नों के समान ही स्फुट रूप से प्रकाशित हैं। कहा जाता है कि एक महाभागवत ब्राह्मण कभी-कभी भगवान् को अपना प्रभु मानकर उनकी स्तुति करता। कभी मित्र के समान परिहास करता। कभी वात्सल्यप्रेम से भरकर उनकी रक्षा करता। कभी अपना प्रिय समझकर उन्हें पुकारता। और कभी कभी परमात्मा मानकर हृदय में उनका ध्यान करता। इस प्रकार ब्राह्मण ने अपनी भाव रति को नाना अवसरों पर नाना प्रकार से व्यक्त किया है। परन्तु निरन्तर कृष्णरति में डूबा होने से वह सब अवस्थाओं में परमानन्द में निमज्जित रहा और शुद्ध प्रेम में स्थित हो गया। इस प्रकार वह स्वच्छ माध्यम था, ठीक उस रत्न के समान जो अपनी प्रकृति के अनुसार नाना रंग दिखाता है। देवर्षि नारद को अपनी वीणा पर भगवान् की लीला का गुणगान करते सुनकर ब्रह्म में लीन चारों कुमारों को भी शरीर में कंप हो चला। एक भक्त पुकार उठा—"यद्यपि केवल भक्तों की सेवा करने से ही मेरी मुक्ति हो सकती है। परन्तु फिर भी मेरा चित्त उन श्रीभगवान् के दर्शनों के लिये बड़ा आतुर हो रहा है जो नवोनित घनश्याम वर्ण हैं।" भक्त में भगवान् के सान्निध्य की ऐसी लालसा को शान्तरति का लक्षण माना जा सकता है। केवला और संकुला रति सामान्यतः कृष्णभक्तों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। सर्वप्रथम वे भक्त हैं जो निरन्तर पूर्ण रूप से श्रीभगवान् की कृपामय स्नेह पर निर्भर रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वे भक्त हैं जिनका श्रीकृष्ण से सखाभाव का सम्बन्ध है। अन्तिम श्रेणी में वे भक्त आते हैं जो श्रीकृष्ण के साथ वात्सल्य प्रेम का सम्बन्ध रखते हैं, अर्थात् जो श्रीकृष्ण के पूज्य हैं। इन तीनों प्रकार के भक्तों का श्रीकृष्ण से भिन्न- भिन्न रसों में सम्बन्ध विकसित होता है। जब कृष्णविषया रति केवल एक रस पर आधारित हो तो उसे केवला कहते हैं। इस प्रकार की केवला रति वाला भक्त क्रमशः श्रीकृष्ण के रसाल जैसे किसी एक नित्य पार्षद जो गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण का निजी सेवक है अथवा श्रीदामा और सुदामा जैसे मित्रों अथवा नन्द यशोदा जैसे वात्सल्य मित्रों के चरणचिह्नों