भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 26

२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जानते कि नदी के समान हो, सागर में भी असंख्य जलचर प्राणी हैं। सागर के निवासी मकर उन नदियों की अपेक्षा नहीं रखते, जो सागर में गिरती रहती हैं। ऐसे ही, जिनका निरन्तर भक्तियोगरूप सागर में निवास है, वे भक्त मुक्तिरूप नदियों की उपेक्षा कर देते हैं। भाव यह है कि जो शुद्धभक्त हैं, वे सदा भगवद्भक्तियोग के सागर में स्थित रहते हैं। अन्य पद्धतियाँ उन नदियों जैसी हैं, जो शनैः शनैः ही सागर तक पहुँचती हैं; शुद्धभक्त को इनसे कोई प्रयोजन नहीं होता। श्रील रूप गोस्वामी अपने गुरुदेव सनातन गोस्वामी से प्रार्थना करते हैं कि वे उन मीमांसकों के तर्कों से भक्तिरसामृतसिन्धु की रक्षा करें, जो भगवद्भक्ति में व्यर्थ हस्तक्षेप करते हैं। उनके अनुसार तर्क-वितर्क सागर में होने वाले बड़बालन जैसे हैं। सागर के मध्य में बड़वाग्नि से कुछ भी हानि नहीं होती। इसी प्रकार, भगवद्भक्ति के विरोधी अपने ब्रह्मानुभूति- विषयक नाना प्रकार के दार्शनिक तर्कों से इस महान् भक्तिसागर में उत्पात नहीं कर सकते। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थ के प्रणेता श्रील रूप गोस्वामी की दैन्योक्ति है कि सर्वथा दीन-हीन होते हुए भी सम्पूर्ण विश्व में कृष्णभावना का प्रसार करने के लिए वे इस प्रयास में प्रवृत्त हो रहे हैं। श्रील रूप गोस्वामी के चरणचिन्हों का अनुसरण करते हुए कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सभी प्रचारकों को इस भाव से भावित रहना चाहिए। हम अपने को कभी महान् उपदेशक न समझें। सदा यही माने कि वह तो केवल पूर्ववर्ती आचार्यों के कार्य का निमित्तमात्र है और उन्हीं के चरणचिन्हों का अनुसरण करने से दुःखी मानवता का कुछ मंगल कर सकता है। भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण—ये चार भाग हैं। इनमें से प्रत्येक भाग में चार लहरी हैं। जैसे सागर में पूर्वादि चारों दिशाओं में भिन्न-भिन्न लहरें उठती हैं, वैसे ही 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में नाना लहरें कल्लोलित हो रही हैं। प्रथम विभाग की चार लहरों में से पहली लहरी में सामान्य भक्ति का निरूपण है। द्वितीय लहरी में भक्तियोग के साधन का अंकन है तथा तीसरी भावाश्रिता है। चौथी लहरी में भगवत्प्रेम का वर्णन है, जो जीवन का परम लक्ष्य है। इन सब का अपने-अपने विशेष लक्षणों सहित विस्तार से वर्णन किया जाएगा। श्रील रूप गोस्वामी ने पूर्ववर्ती आचार्यों का अनुगमन करते हुए भक्ति का प्रामाणिक विवरण इस प्रकार समाहृत किया है—"अनुकूल भाव से श्रीकृष्ण का सेवन करते हुए पूर्ण रूप से कृष्णभावना में तत्पर हो जाना