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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु भगवान् की लीला के चिन्तन में डूबा रहता है—किस प्रकार वे कुरुक्षेत्र में गीता का गान कर रहे हैं अथवा भक्तों सहित वृन्दावन धाम में लीलामग्न हैं। इस विधि से सदा-सर्वदा भगवान् की लीला का स्मरण किया जा सकता है। यह कृष्णभावना की मानस-सेवा है। इसी प्रकार, शारीरिक क्रियाओं से भी अनेक प्रकार से सेवा की जा सकती है। परन्तु ऐसा सम्पूर्ण सेवा-कार्य श्रीकृष्ण से सम्बन्धित होना चाहिए। श्रीकृष्ण के परम्परागत साक्षात प्रतिनिधि—गुरुदेव के चरणारविन्द का आश्रय लेने से यह सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। अतः शरीर द्वारा कृष्णभावनाभावित क्रियाओं का आचरण गुरुदेव की आज्ञा के अनुसार श्रद्धापूर्वक करना कर्तव्य है। गुरु-पादाश्रय का नाम दीक्षा है। गुरुदीक्षा के दिन से श्रीकृष्ण और कृष्ण- भावना के सेवक में एक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। सद्गुरु से दीक्षित हुए बिना कृष्णभावना से यथार्थ सम्बन्ध होता ही नहीं। कृष्णभावना का यह सेवन प्राकृत नहीं है। सामान्यतः श्री भगवान् की तीन शक्तियाँ हैं—बहिरंगा, अन्तरंगा और तटस्था। जीव तटस्था शक्ति कहलाते हैं, जबकि प्राकृत सृष्टि बहिरंगा शक्ति अथवा अपरा प्रकृति का कार्य है। फिर, एक वैकुण्ठ-जगत् है, जो अन्तरंगा शक्ति का प्रकाश है। जीव तटस्था शक्ति इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि अपरा बहिरंगा शक्ति के अधीन कार्य करते समय वे प्राकृत कर्म करते हैं और जब अन्तरंगा परा शक्ति के अन्तर्गत क्रियाशील रहते हैं, तो उनके कर्म कृष्णभावनाभावित हो जाते हैं। भाव यह है कि महात्मा महाभागवत पुरुषों का कार्य माया के आधीन नहीं होता; वे परा प्रकृति के आश्रय में कर्म करते हैं। भक्तियोग अथवा कृष्णभावना में जो कुछ किया जाता है, वह सब प्रत्यक्ष रूप से परा प्रकृति के नियन्त्रण में है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति एक प्रकार की शक्ति है जिसे योग्यगुरु और श्रीकृष्ण दोनों की कृपा से दिव्य बनाया जा सकता है। कृष्णदास कविराज द्वारा विरचित 'चैतन्यचरितामृत' में श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि किसी दुर्लभ भाग्यवान् पुरुष को ही श्रीकृष्ण की कृपा से सद्गुरु का संग प्राप्त होता है। परमार्थ के यथार्थ जिज्ञासु को श्रीकृष्ण ऐसा बुद्धियोग देते हैं, जिससे वह सद्गुरु की शरण में चला जाता है और फिर, गुरुकृपा से कृष्णभावना में उन्नति करता है। इस प्रकार कृष्णभावना का सम्पूर्ण परिमण्डल साक्षात् परा प्रकृति—गुरु और श्रीकृष्ण के आधीन है। प्राकृत-जगत् से इसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। 'कृष्ण' नाम अंशों सहित साक्षात् श्रीभगवान् का वाचक है। श्रीकृष्ण के असंख्य स्वांश,