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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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प्रस्तावना [ ५ भिन्न-अंश और भिन्न-भिन्न शक्ति-प्रकाश हैं। दूसरे शब्दों में, 'कृष्ण' सब कुछ है; 'कृष्ण' में सम्पूर्ण तत्त्व का समावेश है। परन्तु सामान्यतः हमें कृष्णनाम से श्रीकृष्ण और उनके अंशों को ही समझना चाहिए। श्रीकृष्ण बलदेव, संकर्षण, वासुदेव, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, राम, नृसिंह, वराह, आदि अंशों और विष्णुमूर्तियों में प्रकाशित हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार, ये सब अंश और अवतार सागर की लहरों के समान ही असंख्य हैं। अस्तु, श्रीकृष्ण के तत्त्व में इन सभी अंशों और शुद्धभक्तों का समावेश है। ब्रह्मसंहिता के अनुसार श्रीकृष्ण के अंश पूर्ण आनन्दमय, चिन्मय और नित्य हैं। भक्तियोग का तात्पर्य उन कृष्णभावनाभावित क्रियाओं का आचरण करना है, जो भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य आनन्द के अनुकूल हों, उसका वर्धन करें। इसके विपरीत, जो क्रिया श्रीभगवान् के दिव्य आनन्द के प्रतिकूल है, वह भक्ति नहीं हो सकती। उदाहरणार्थ, रावण, कंस, हिरण्यकशिपु जैसे महादानव निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण किया करते थे; परन्तु वे ऐसा उन्हें अपना शत्रु समझ कर करते थे। इसप्रकार के चिन्तन को भक्तियोग अथवा कृष्णभावना नहीं कहा जा सकता। निर्विशेषवादी कभी-कभी भक्तियोग को ऐसे भ्रान्त रूप में समझते हैं कि श्रीकृष्ण को उनके लीलापरिकर और उपकरणों से अलग कर बैठते हैं। जैसे, सब जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता का प्रवचन कुरुक्षेत्र में किया। परन्तु निर्विशेषवादियों का कहना है कि श्रीकृष्ण का महत्त्व तो है, पर कुरुक्षेत्र का नहीं है। भक्त भलीभांति समझते हैं कि श्रीकृष्ण से सम्बन्ध के बिना कुरुक्षेत्र से उनका कोई प्रयोजन नहीं होता। इसके अति- रिक्त, कृष्णनाम का अभिप्राय केवल श्रीकृष्ण तक सीमित नहीं है। श्रीकृष्ण सदा अपनी लीला के परिकरों और उपकरणों से युक्त रहते हैं। जैसे कोई कहे, "शस्त्रधारी को भोजन कराओ।" भोजन शस्त्रधारी मनुष्य ही करता है, शस्त्र नहीं; शस्त्र उसकी पहचान का साधन अवश्य है। ऐसे ही, कृष्णभावना में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि आदि उन सभी उपकरणों और स्थलों में भक्त की रुचि रहती है, जिनका श्रीकृष्ण से कुछ भी सम्बन्ध हो। वे किसी साधारण युद्धभूमि में रुचि नहीं लेते। उनकी रुचि श्रीकृष्ण में, उनकी वाणी में, उनके उपदेश आदि में है। श्रीकृष्ण वहाँ हैं, इसीलिए कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि का इतना महत्त्व है। कृष्णभावना क्या है—उपरोक्त वर्णन में यह सार रूप में निभृत है। इस बोध के बिना यह समझने में अवश्य भूल होगी कि भक्त कुरुक्षेत्र