भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की युद्धभूमि में क्यों रुचि रखते हैं। जिसकी श्रीकृष्ण में रुचि है, वह उनकी विविध लीलाओं और क्रियाओं में भी रुचि लेता है। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में श्रील रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित लक्षणों के अनुसार शुद्धभक्त के स्वरूप का संक्षिप्त निरूपण इस प्रकार है : वह सदा अनुकूल भाव से श्रीकृष्ण की सेवा के परायण रहता है। ऐसी कृष्ण- भावनाभावित क्रियाओं की शुद्धता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि वह सब प्रकार की प्राकृत इच्छाओं और मनोधर्म से मुक्त हो। भगवत्- सेवा करने की इच्छा के अतिरिक्त अन्य सभी इच्छायें प्राकृत हैं। साथ ही, उस मनोधर्मी का भी निषेध है, जिससे अन्त में शून्यवाद अथवा निर्वि- शेषवाद का निष्कर्ष निकले। कृष्णभावनाभावित पुरुष के लिए ऐसा निष्कर्ष निरर्थक है। यह बड़ा दुर्लभ है कि कोई दार्शनिक मनोधर्म के द्वारा वासुदेव (भगवान् श्रीकृष्ण) की आराधना के निष्कर्ष पर पहुँच जाय। स्वयं भगवद्- गीता इस कथन की पुष्टि है। अस्तु, दार्शनिक मनोधर्म का अन्तिम लक्ष्य भी यह जान लेना है कि श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं; वे सर्वव्यापक और सब कारणों के परम कारण हैं, इसलिए उन्हीं के शरणागत हो जाना चाहिए। यदि यह अन्तिम लक्ष्य उपलब्ध हो जाय, तो दार्शनिक उन्नति अनुकूल है; परन्तु यदि उससे शून्यवाद अथवा निर्विशेषवाद सिद्ध होता है, तो उसे भक्ति नहीं कहा जा सकता। कर्म से प्रायः सकाम कर्मकाण्ड का अर्थ किया जाता है। ऐसे बहुत से मनुष्य हैं, जिनकी वैदिक कर्मकाण्ड में प्रगाढ आसक्ति है। परन्तु यदि कोई श्रीकृष्ण के बोध के बिना कर्मकाण्ड में आसक्त हो, तो उसके कर्म कृष्णभावना के प्रतिकूल समझे जायेंगे। वास्तव में कृष्णभावना के लिए श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि साधन पर्याप्त हैं। श्रीमद्भागवत में भक्ति के नौ साधनों का उल्लेख है। इनके अतिरिक्त अन्य जो कुछ भी किया जायगा, वह कृष्णभावना के प्रतिकूल होगा। अतः इन पतनों से अपने को बचाना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति के निरूपण में 'ज्ञानकर्मादि' शब्द का प्रयोग किया है। 'कर्म' शब्द से उन क्रियाओं की ओर संकेत है, जो शुद्ध भक्तियोग के अनुकूल नहीं हैं। वैराग्य के बहुत से मिथ्या रूप भी कृष्ण- भावनाभावित भक्तियोग के अनुकूल नहीं होते। भक्ति के लक्षणों का प्रतिपादन करने के लिए श्रील रूप गोस्वामी ने 'नारदपंचरात्र' से एक श्लोक उद्धृत किया है—'कृष्णभावनाभावित होकर सब प्रकार की उपाधियों और दोषों से मुक्त हो जाना चाहिए। ऐसी